Mera astitva
मेरा अस्तित्व
इक छोटी सी हार से, कभी रुकना मत
जो गलत हो उसके समक्ष कभी झुकना मत
लोगों का क्या है पल में अपनी सोच बदल लेते हैं
मतलब निकलते ही उस जगह से निकल लेते हैं
जलन ईर्ष्या जैसी बीमारी से लोग बीमार बैठे हैं
गिराकर दूसरों को नीचे खुद ऊपर आने के लिए तैयार बैठे हैं
खुद गलत होकर भी आपको झुकाएंगे
नासमझी की बातें समझदारी से समझाएंगे
पहचान के अपने आप को टूटना मत
जो गलत हो उसके समक्ष कभी झुकना मत।
जो दिया है ऊपरवाले ने सबर कर लो
हंसते मुस्कुराते जिंदगी बसर कर लो
हर जगह कमजोर बने रहना अच्छा नहीं होता
जो अपने अस्तित्व के लिए लड़े क्या वह सच्चा नहीं होता
गर्व से सिर उठा कर खुद को जानो
क्या पहचान है तुम्हारी इस बात को पहचानो
'कल्पना' जिंदगी की दौड़ में पीछे छूटना मत
जो गलत हो, उसके समक्ष कभी झुकना मत।
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| कल्पना अवस्थी |


बहुत ही प्रेरणादायक कविता है । आपकी रचना अत्यंत सराहनीय है।
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