Beti ki bidai kavita kalpana awasthi
बेटी की विदाई
बेटी की विदाई इतनी आसान कहाँ होती है
रहते हैं माँ-बाप बिना बेटी के भी
पर सच है कि उनमें जान कहाँ होती है
घर के आंगन में जब बेटी अपना पहला कदम उठाती है
माँ की ममता देखो तन -मन से हरषाती है
पापा का काम से लौट कर घर आने का इंतजार करना
बेटों से बढकर भी माँ पापा की देखभाल करना
माँ से कहना आप थक गई हैं आराम कर लो
बस प्यार से मुझे अपने आँचल में भर लो
पापा की उंगली थाम कब बड़ी हो जाती हैं
इक नई जिम्मेदारी उनके लिए खड़ी हो जाती है
पूरी दुनिया बन जाती हैं पापा की सिर्फ इक अरमान कहाँ होती हैं
बेटी की विदाई इतनी आसान कहाँ होती है
पाई -पाई लगा देता है इक पिता,बेटी की खुशी के लिए
कि मेरी बेटी की शादी में कुछ कमी ना हो
ऐसा कहते वक्त गौर से देखिए
उस पिता की आँखो में नमी ना हो
सीने से लगाकर जब पिता बेटी अपनी विदा करता है
खुश रहे मेरी बेटी सदा ये दुआ करता है
मायके में छोड़ जाती हैं अपना बचपन
वो अपने पापा के घर में मेहमान कहाँ होती हैं
बेटी की विदाई इतनी आसान कहाँ होती है
अपना घर छोड़ जाना आसान नहीं होता
ऐसा नहीं कि बेटी का दिल परेशान नहीं होता
भाई -बहनों की लड़ाई फिर भी साथ खाना
हंसते मुस्कराते हुए सारा घर सिर पर उठाना
बहुत याद आएगी आप सबकी पापा
ऐसा कहते ही रोने लग जाना
अपनो से दूर जा इक नई दुनिया बसानी है
कल्पना इस बात से बेटी अंजान कहाँ होती है
बेटी की विदाई इतनी आसान कहाँ होती है।
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| कल्पना अवस्थी |
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