मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

Hindi poem on childhood-बचपन की कविता/सीताराम चौहान पथिक


Hindi poem on childhood

Hindi-poem-childhood


       

बचपन ।। 




बच्चों में मैं बच्चा बन कर , 

बचपन को  दोहराता  हूं । 

खूब खेलता बच्चों के संग , 

मैं बच्चा  बन  जाता  हूं ।। 


झूठ- मूठ के नाना व्यंजन , 

गुड़िया के संग खाता  हूं  । 

नन्हे  बर्तन  जब  बिखराती , 

क्रम  से  उन्हें सजाता   हूं ।। 


गुड़िया घर  की  राजकुमारी, 

हॄदयासन पर  शासन करती । 

उसकी  आज्ञा का उल्लंघन , 

डांट - डपटती, भाषण करती 


गुड़िया की इक नन्ही गुड़िया, 

झाड़- पोंछ कर उसे सजाती। 

गुड्डे राजा  दूल्हा बन  जाते  , 

नन्ही गुड़िया दुल्हन बन जाती  


ठुमुक ठुमुक कर राजा चलता  

पीछे  नन्ही  गुड़िया  रानी  । 

इक दिन अपनी गुड़िया की , 

हा, बन  जाएगी यही कहानी 


यही सोच भावुक हो जाता , 

जाने  कब बचपन खो जाता । 

गुड़िया आती - माटी खाती  , 

मुझे खिलाती, शिशु हो जाता 


दोनों खूब चहकते दिन भर, 

थोड़ी  माटी मैं  भी  खाता । 

अपने बीत  गए बचपन  को , 

गुड़िया में पाकर मैं मुस्काता । 

Hindi -poem- childhood
 सीताराम चौहान पथिक



  

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