Hindi poem on childhood
बचपन ।। |
बच्चों में मैं बच्चा बन कर ,
बचपन को दोहराता हूं ।
खूब खेलता बच्चों के संग ,
मैं बच्चा बन जाता हूं ।।
झूठ- मूठ के नाना व्यंजन ,
गुड़िया के संग खाता हूं ।
नन्हे बर्तन जब बिखराती ,
क्रम से उन्हें सजाता हूं ।।
गुड़िया घर की राजकुमारी,
हॄदयासन पर शासन करती ।
उसकी आज्ञा का उल्लंघन ,
डांट - डपटती, भाषण करती
गुड़िया की इक नन्ही गुड़िया,
झाड़- पोंछ कर उसे सजाती।
गुड्डे राजा दूल्हा बन जाते ,
नन्ही गुड़िया दुल्हन बन जाती
ठुमुक ठुमुक कर राजा चलता
पीछे नन्ही गुड़िया रानी ।
इक दिन अपनी गुड़िया की ,
हा, बन जाएगी यही कहानी
यही सोच भावुक हो जाता ,
जाने कब बचपन खो जाता ।
गुड़िया आती - माटी खाती ,
मुझे खिलाती, शिशु हो जाता
दोनों खूब चहकते दिन भर,
थोड़ी माटी मैं भी खाता ।
अपने बीत गए बचपन को ,
गुड़िया में पाकर मैं मुस्काता ।
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| सीताराम चौहान पथिक |













