Bachpan par hindi kavita
कोई लौटा दे मेरा बचपन
हर तरफ फैला बस खुशियों का तराना था
सबसे प्यारा वह बचपन का जमाना था ।
मां की गोद थी, पापा का प्यार था
दादी की सीख थी,अपनों का संसार था
कहां फंस गए समझदारी के जाल में
वह बचपन हर दुख से अनजाना था
हर तरफ फैला बस खुशियों का तराना था।
दादी की कहानी सुनकर ही रातों को नींद आती थी
सुबह-सुबह मां की मीठी आवाज जगाती थी
हमारे हर काम के लिए मां का पीछे दौड़ना
पापा का ले जाकर स्कूल छोड़ना
सालों बीत गए, जल्दी सोए हुए
सुबह की भाग दौड़ में खुद को खोए हुए
खड़े हैं ऐसे रास्ते पर कि, बचपन तो याद ही आना था
सबसे प्यारा वह बचपन का जमाना था।
जो चीज पसंद हो बस वही चाहिए
सही हो तो गलत और गलत हो तो सही चाहिए
खुश करने के लिए हमें, वह चीज ला देना
अपने हाथों से तोड़कर मां, का रोटी खिला देना
अब तो जो मिल जाए पसंद है, खुद को समझा लेते हैं
बीत गया वो वक़्त, जब जिद पूरी करवा लेते थे
बहुत वक्त बीत गया मां तेरे हाथ से खाए हुए
लिखते हुए इस कविता को आंसू है आए हुए
पता नहीं मां का प्यार था, या स्वादिष्ट वह खाना था
सबसे अच्छा वह बचपन का जमाना था ।
ठंडी में ठंड लग जाएगी,मां होती परेशान थी
गर्मी से बाहर क्यों गई इस बात से हैरान थी
जरा सी चोट पर मैं, घर में कोहराम मचा देती थी
चींटी मर गई तेरे गिरने से यह बात समझा देती थी
तब से आज तक बस हर दर्द पर मुस्कुरा देती हूं
अब तो नन्ही 'कल्पना' नही समझदार सी बेटी हूं
गुजारिश है वक्त से मेरी आज की,
सबकुछ ले लो मेरा, पर बचपन लौटा दो
थक गई है समझदारी से अब
बेबसी, घुटन व लाचारी से अब
उस बचपन की याद को 'कल्पना' को रुला जाना था
सबसे अच्छा वह बचपन का जमाना था।
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| कल्पना अवस्थी |


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