मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

Hindi kavita jeevan ke rang-जीवन के रंग/सीताराम चौहान पथिक

 Hindi kavita jeevan ke rang

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       जीवन  के  रंग  । 


नील- गगन में उड़ा जा रहा था हंसो का जोड़ा , 

आखेटक था खड़ा ताक में , बाण वहीं से छोड़ा , 

आहत होकर गिरी हंसिनी -- पीड़ा  से  अकुलाई  , 

आखेटक  अट्टहास  कर उठा था  अति  क्रूर  निगोड़ा । 


करुणामयी दृष्टि बस  डाली , -- हंसिनी  ने  प्रियतम पर , 

और मुऺद गये नयन - वियोगी बना हंस  जीवन - भर , 

अब उड़ना सब छूट गया था , - विरह - दंश असह॒य था , 

मोती नयनों से झरते थे , निराहार  बस दिन भर । 


अति  कॄस -  काय हंस  को , 

साथी  भी  पहचान  ना पाते , 

जीवन - दर्शन की सब  बातें , 

उसे  सुना  समझाते , 

हंस सरोवर में सहचरि की , -- स्मृतियों  में  खोया रहता , 

करते सभी किलोले , उसको यह  सब  तनिक ना  भाते । 


एक दिवस मोहिनी हऺसिनी -- आकर  उससे  बोली , 

यह कैसी दुर्दशा  बना  ली --सोचो  तो  हमजोली , 

किसी एक के लिए त्यागना , 

जीवन  उचित  नहीं है , 

नये सिरे से  आओ  सजा लें , 

-- हम  जीवन  की  डोली  । 


अनुभव हुआ हंस को  जैसे - मोहिनी - रूप  वह  आई , 

जीवन की  सूखी बगिया में - नव - वसन्त ऋतु  लाई  । 

एकाकीपन  मिटा  --- हंस ने दिया  मौन  आमंत्रण , 

मोहिनी ने आगे बढ़ कर , फिर अपनी  चोंच  मिलाई ।। 

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सीताराम चौहान पथिक

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