kavita- seeta ki vyatha
सीता की
व्यथा ।
भूमि - सुता ---सीता जननि ,
त्याग - पुंज अभिराम ।।
नारि - जगत की प्रेरणा ,
त्वम श्री चरण प्रणाम ।।
दोनों ही अनुपूरणक ,
सिया और श्री राम ।
भारत - भू कॄत - कॄत हुई ,
जपहि निरन्तर नाम ।।
पितॄ - पक्ष ससुराल - पक्ष ,
दोनों कुल की कानि ।
सिया - चरित आदर्श है ,
नारी --- तू पहचान ।।
वनवासी श्री राम की ,
सेवा का सद - धर्म ।
छाया बन कर सिया ने ,
सदा निभाया धर्म ।।
धन्य - धन्य मां जानकी ,
राम - आज्ञा को मान ।
अग्नि - परीक्षा दी तदपि ,
खोली नहीं जुबान ।।
लोकापवाद से हिल गई ,
राम - राज्य प्राचीर ।
सीता जैसी पति - व्रता ,
आरोपों के तीर ।।
जन - संशय नहीं थम सका ,
हुआ पुनः वन - वास ।
राम - हॄदय की वेदना ,
भूल गया इतिहास ।।
सीता युग की चेतना ,
मर्यादा का नाम ।
नारी का आदर्श सिय ,
सिया बिनु ना ही राम ।।
जनक - नंदिनी की व्यथा ,
नारी का कटु सत्य ।
शिला अहिल्या युगों तक ,
सहती रही असत्य ।।
रघुकुल की सौभाग्य लक्ष्मी ,
क्रूर भाग्य का लेख ।
सुखमय जीवन जी सकें ,
सिया के भाग्य ना रेख ।।
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| सीताराम चौहान पथिक |
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