रविवार, 29 नवंबर 2020

Hindi kavita kaanha ka aatm nivedan-कान्हा का आत्म निवेदन/सृष्टि कुमार श्रीवास्तव

 Hindi kavita kaanha ka aatm nivedan

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कान्हा का आत्म निवेदन


तुम होती तो निश्चित करती

जग  क्यूं फ़िकर करे।

जब से डूबे प्राण प्रीति मे

अब    तक  ना उबरे।


 शायद तुमको याद न हों अब

यमुना तट की बातें ।

मधुर मधुर वचनो को सुनकर

खिल जाती थीं रातें ।


तुम ऐसे हंसती थी जैसे

हर सिंगार झरे।


दूर  गगन  मे जब भी टूटा

कोई   पुच्छल तारा।

उस तारे   से मैने मांगा

केवल   साथ तुम्हारा।


लेकिन तुमसे कह ना पाया

जग से बहुत डरे।



धड़कन धड़कन प्रीति तुम्हारी

ऐसे गुंजन करती।

जैसे अम्बर की बांहों मे

धरती नर्तन करती।


तन तो ब्याह गया मन क्वांरा

यादों मे विचरे।


याद बहुत आती हैं मुझको

वे कदम्ब की डालें 

बतरस भीगे अधर तुम्हारे

मधुरस डूबे प्याले।


किसको गरज़ पडी जो मेरे

मन का कलश भरे।


प्यासे अधरों  पर  मेरे अब

मुरली  कौन  धरे।

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सृष्टि कुमार  श्रीवास्तव

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