पूजक प्रतिमाओं के- सृष्टि कुमार श्रीवास्तव
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पत्थर की हैं तो होने दो हम पूजक प्रतिमाओं के। वैसे तो ये नही बोलतीं कभी कभी बोलीं । आर्त स्वरों मे गया पुकारा तब जाके डोलीं। अहोभाव मे जो रहती हैं हम याजक ऋषिकाओं के। देखा देखी भेंड चाल से तृण भी नही हिला। प्रश्न मिले जीवन को लेकिन उत्तर नही मिला। तुम्हे बांचना जो भी बांचो हम सर्जक सहिंताओं के। भले कीच मे जन्मे फिर भी खिल कर कमल हुए। सूर कबीरा तुलसी दिनकर तप कर विमल हुए। तुम स्वाती की बूंद तलाशो हम चातक उल्काओं के। धन पद यश का ढ़ेर भले हो काम न आता है। मर घट के आगे का रिश्ता कर्म
निभाता है। तुम सिंहासन के गुण गाओ हम चारण प्रतिभाओं के सृष्टि कुमार श्रीवास्तव |

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