आरक्षणी चुनावी दोहे
आरक्षणी चुनावी दोहे
पढ़े- लिखे मारे फिरै , बात बनै नहि कोय ।
आरक्षण के यान पर , चढै तो अफसर होय ।।
जाति - पाति का पालना , नेता रहे झुलाय ।
निर्धनता को ताक रखि, दूध - मलाई खाय ।।
आरक्षण- अधिनियम का , पन्द्रह वर्ष आधार ।
द्रौपदि के अब चीर सम , कोई आर ना पार ।।
गिद्ध - दृष्टि नेताओं की , आरक्षण पर जाय ।
रहें सलामत कुर्सियां , राष्ट्र रसातल जाय ।।
आरक्षण के मंच पर , नेताओं की भीड़
लगे बांटने रेवड़ी , झुकी राष्ट्र की रीढ़ ।।
त्रिवेणी संगम पर गये , नेता धोने पाप ।
कैसे मन में शान्ति हो , पर - निन्दा का जाप ।।
आरक्षण की नाव पर , नेता ढुल - मुल होय ।
प्रतिद्वंद्वी श्रेय ले रहे , आपु पसीना होय ।।
जोड़- तोड़ कर किस तरह , कुर्सी ली हथियाय ।
भ्रष्ट - आचरण जांच में , कुर्सी छिनती जाय ।।
क्रीम - परत के कारणे , आरक्षण यदि जाय ।
मन - चाही सीमा बढ़ा , नेता करहि उपाय ।।
जन - संख्या अनुपात से , आरक्षण अधिकाय ।
बेकारी में नव -युवक , आतंकी बन जाय ।।
संविधान में नारि - नर , दोनों एक समान ।
आरक्षण किस बात का , अवसर एक समान ।।
नैया है मझधार में , रहा खिवैया सोय ।
पार लगै नैया तभी , जगत - खिवैया होय ।।
सीता राम चौहान पथिक ।

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