गुरुवार, 22 अक्टूबर 2020

आरक्षणी चुनावी दोहे -सीता राम चौहान पथिक

  आरक्षणी चुनावी  दोहे

aarakshanee- chunaavee - dohe

आरक्षणी चुनावी  दोहे

पढ़े- लिखे मारे फिरै , बात बनै नहि कोय

आरक्षण के यान पर , चढै तो अफसर होय ।।


जाति - पाति का पालना , नेता रहे  झुलाय

निर्धनता को ताक रखि, दूध - मलाई खाय ।।


आरक्षण- अधिनियम का , पन्द्रह वर्ष आधार

द्रौपदि के अब चीर सम , कोई आर ना पार ।।


गिद्ध - दृष्टि नेताओं की , आरक्षण पर जाय

रहें सलामत कुर्सियां , राष्ट्र रसातल जाय ।।


आरक्षण के मंच पर , नेताओं की भीड़

लगे बांटने रेवड़ी , झुकी राष्ट्र  की रीढ़ ।।


त्रिवेणी संगम पर गयेनेता धोने पाप

कैसे मन में शान्ति हो , पर - निन्दा  का जाप ।।


आरक्षण की नाव पर , नेता ढुल - मुल होय

प्रतिद्वंद्वी श्रेय ले रहे , आपु पसीना  होय ।।


जोड़- तोड़ कर किस तरह , कुर्सी ली हथियाय

भ्रष्ट - आचरण जांच में , कुर्सी छिनती जाय ।।


क्रीम - परत के कारणे , आरक्षण यदि जाय

मन - चाही सीमा बढ़ा , नेता करहि उपाय ।।


जन - संख्या अनुपात से , आरक्षण अधिकाय

बेकारी में नव -युवक , आतंकी बन जाय ।।


संविधान में नारि - नर , दोनों एक समान

आरक्षण किस बात का , अवसर एक समान ।।


नैया  है झधार में , रहा खिवैया सोय

पार लगै नैया तभी , जगत - खिवैया  होय ।।

सीता राम चौहान पथिक

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