गुरुवार, 12 नवंबर 2020

जीवन- एक नाटक-jeevan ek naatak

 jeevan ek naatak

Jeevan-ek-naatak



           


        जीवन -- एक नाटक  । 


कहां गया बचपन मन - भाता

कहां गया यौवन  मद  -- माता, 

शतदल की पंखुड़ियां सिकुड़ी , 

स्वर्णिम  समय नहीं फिर आता । 


यौवन के मधुरिम पल जैसे  , 

अलि मधु - पान करते हों जैसे , 

क्या  अनन्त मधु  रस  में डूबी 

 रिक्त - पात्र अब जीवन जैसे । 


कैसे मन को  धीर  बऺथाऊऺ  ॽ 

 बचपन का वह गीत सुनाऊं   , 

हरा वॄक्ष अब ठूंठ  हो  गया  , 

सूना  नीड़ , अब किसे बसाऊं । 


एक - एक  कर  गए  सभी , 

जीवन - नाटक के पात्र सभी , 

अभिनय  सशक्त कर गए सभी , 

है  सूत्र  - धार  की कथा अभी । 


गया  समय लौटे जाने कब  , 

सूत्र  - धार  पन्ने समेट  अब , 

नाटक  का अवसान सन्निकट , 

दर्शक  गये , पथिक शेष अब ।। 

सीताराम चौहान पथिक






+91-9650621606

सीताराम चौहान पथिक

1 टिप्पणी:

  1. आदरणीय पथिक सर ने पूरे जीवन की गतिविधियों को इस कविता मे बता दिया हृदय से शुभकामना

    जवाब देंहटाएं

सभी साथियों से अनुरोध है कि यदि आपकी मातृभाषा हिंदी है,
तो यहाँ अपनी टिप्पणी भी हिंदी (देवनागरी लिपि)
में ही प्रकाशित करने की कृपा कीजिए!
टिप्पणी पोस्ट करने से पहले
ई-मेल के द्वारा सदस्यता ले लिया कीजिए,
ताकि आपकी टिप्पणी प्रकाशित होने के बाद में यहाँ होनेवाली चर्चा का पता भी आपको चलता रहे और आप बराबर चर्चा में शामिल रह सकें!