jeevan ek naatak
जीवन -- एक नाटक ।
कहां गया बचपन मन - भाता
कहां गया यौवन मद -- माता,
शतदल की पंखुड़ियां सिकुड़ी ,
स्वर्णिम समय नहीं फिर आता ।
यौवन के मधुरिम पल जैसे ,
अलि मधु - पान करते हों जैसे ,
क्या अनन्त मधु रस में डूबी
रिक्त - पात्र अब जीवन जैसे ।
कैसे मन को धीर बऺथाऊऺ ॽ
बचपन का वह गीत सुनाऊं ,
हरा वॄक्ष अब ठूंठ हो गया ,
सूना नीड़ , अब किसे बसाऊं ।
एक - एक कर गए सभी ,
जीवन - नाटक के पात्र सभी ,
अभिनय सशक्त कर गए सभी ,
है सूत्र - धार की कथा अभी ।
गया समय लौटे जाने कब ,
सूत्र - धार पन्ने समेट अब ,
नाटक का अवसान सन्निकट ,
दर्शक गये , पथिक शेष अब ।।
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| सीताराम चौहान पथिक |
+91-9650621606
सीताराम चौहान पथिक


आदरणीय पथिक सर ने पूरे जीवन की गतिविधियों को इस कविता मे बता दिया हृदय से शुभकामना
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