गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

poetry on manzil-मंजिल के पास पहुँचकर भी हारती रही मैं/ कल्पना अवस्थी

 poetry on manzil

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मंजिल के पास पहुँचकर भी हारती रही मैं

 

मंजिल के पास पहुँचकर भी हारती रही मैं

फिर भी बिखरे सपनों को संवारती रही मैं

लड़ती थी रात के अँधेरे से

नहीं डरती थी मेहनत के थपेड़े से

जब सब सोते थे तब जागती थी मैं

मुश्किलों के डर से कहाँ भागती थी मैं

कुछ कर गुजरने का हौसला कभी टूटा नहीं

क्योंकि हौसला देने वाले का साथ कभी छूटा नहीं

बनाकर रेत पर घर,खुद अपने हाथों बिगाड़ती रही मैं

मंजिल के पास पहुँचकर भी हारती रही मैं।

 

कुछ होश नही था बस याद अपना सपना था

कैसे भी करके सच उसे करना था

ना खाने का समय था सोने का था

कुछ अच्छा हुआ था और कुछ अच्छा होने का था

उम्मीदों के गहरे सागर में इक उम्मीद

अपने लिए तलाशती रही मैं

मंजिल के पास पहुँचकर भी हारती रही मैं

 

थक गई हूँ पर उम्मीदें अभी नहीं छूटी हैं

दोष किसको दूँ शायद तकदीर ही मुझसे रूठी है

पर हार मान लेना भी कायरता है

ऊपरवाला ही नया विश्वास मन में भरता है

वादा है इस बार जीत के दिखाऊँगी

जिन आँखों में मेरे लिए विश्वास है 

उस विश्वास को बचाऊँगी

किसी का भरोसा कल्पना के लिए

उसके लक्ष्य से भी बड़ा है

जो उम्मीदों का दामन थामे मेरी 

कामयाबी के इंतज़ार में खड़ा है

उन उम्मीद भरी आँखों में ही निहारती रही मैं

मंजिल के पास पहुँचकर भी हारती रही मैं।

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कल्पना अवस्थी


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