bheetar se insaan vahee hai
भीतर से इंसान वही है
मेरे देखे इस दुनियां मे
सब कुछ पहले जैसा है ।
दीवारों पर रंग नया है
लेकिन घर का हाल वही है।
वही बाप है शौहर वो ही
वही तमाचा गाल वही है ।
शोषक वे ही शोषित वे ही
बाप अभी भी पैसा है ।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे का
भरम वही अभिमान वही है।
बाहर से तो बदल गया है
भीतर से इंसान वही है ।
पहले भी बंदर जैसा था
बन्दर अब भी वैसा है ।
एक ठिकाने चका चौंध है
एक ठिकाने अन्धियारा है ।
आम आदमी झोपड़पट्टी
नेता पंच सितारा है ।
विलख रही मानवता का जी
हाल न पूछो कैसा है ।
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| सृष्टि कुमार श्रीवास्तव |
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