बुधवार, 2 दिसंबर 2020

Arvind jaiswal hindi kavita-अतृप्त रेत और इच्छा

Arvind jaiswal hindi kavita

Arvind-jaiswal -hindi-kavita



 अतृप्त रेत 

जब तेरा ही अंश जब तेरा ही वँश, 

चन्द सिक्कों को पाने के लिए, 

जब तेरा ही कुटुम्ब तेरा प्रतिबिम्ब्

तुझको ही रास्ते से हटाने के लिए, 

तरकश से अग्निबाण छोड़े, 

उस क्षणिक तूफान को गुजर जाने दे, 

अथाह शांति सागर में समाने के लिए, 

धीरे धीरे शीतल हवायें लौटेंगी, 

जो जलते बिचलित मन सहलाकर, 

प्रेम से सराबोर कर देंगी, 

तू फिर से मचलेगा अतृप्त रेत की तरह, 

बाहें फैलाकर दोडेगा उनको पाने के लिए, 

अरविंद उस आलिंगन से परमानंद मिलेगा, 

क्षमाकर भटकों को सही राह पर लाने के लिए।


इच्छा

मन के तार सजाकर हमने,

 वीणा में साजे हैं।

तुमको आनंदित करने को, 

स्वर हमने साधे हैं। 

मन के तार सजाकर हमने, 

वीणा में साजे हैं।। १।। 

हाथों में जयमाल लिये मैं, 

कब से करूँ प्रतीक्षा। 

तुम्हें वरण करने की प्रियतम, 

जाग रही है इच्छा। 

इन नयनों के द्वार तुम्हारे, 

दर्शन को प्यासे हैं।

मन के तार सजाकर हमने, 

वीणा में साजे हैं।। २।। 

धूल धुंध धूसरित नयन, 

जब जोर चली पुरवाई। 

श्यामलता की धार हमारे, 

नयनों से बह आई। 

तुम्हें रिझाने को अरविंद ने,

 पग घुंघरु बांधे हैं। 

मन के तार सजाकर हमने, 

वीणा में साजे हैं।। ३।।

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अरविंद जायसवाल

 

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