Maa par kavita
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| ममता का आँचल |
ममता का आँचल
मां , मुझे इक बार ॴचल में ,
छिपा लो ----थक गया हूं ।
ममता भरी लोरी सुना दो ,
थपथपा दो ---- थक गया हूं
तुमको देखा नहीं किन्तु अनुभव किया है ,
ममता की देवी सदा मानता हूं
तुम्हीं गंगा यमुना सी बहती रही हो
सदा मन से मै तो यही मानता हूं ।
झिलमिल सितारों में सब से प्रकाशित ,
सितारा तुम्हें मानता आ रहा हूं ,
सुख - दुःख निजी इनसे बांटे हैं मैंने ,
सितारों को मां मानता आ रहा हूं ।
परमात्मा में भी , मां तुम छिपी हो ,
प्रकॄति ने भी ममता तुम्हीं से है पाई ।
विमुख हो गया था - मैं जब दुधमुंहा था ,
दादी का ले रूप - ममता लुटाई ।
विमुख आज भी हूं मैं अपने सगो से ,
फिर भी कर्तव्य की डोर थामे खड़ा हूं ।
मेरे आज अपने पराए से लगते ,
है जीवन यही -अग्निपथ पर खड़ा हूं ।
अभिमन्यु सा बनके मैं रह गया हूं ,
संघर्ष रत हूं निजी चक्रव्यूह में
कवच अपनी आशीष का - मुझको दे दो ,
विजयी बन सकूं - इस विषम चक्रव्यूह में ।
मां , तुम जहां भी हो - आशीष देना ,
भंवर में फंसा हूं - किनारे लगाना ।
भटकता हुआ भीष्म हूं मैं तुम्हारा ,
अमिय - बूंद देकर अमरता जगाना ।
मां, अपने ॴचल में - दो पल सुला लो ,
स्नेह- ऊर्जा तुमसे मैं पा सकूंगा ।
जो दायित्व आधे - अधूरे बचे हैं ,
पथिक पूर्ण करके मैं - तुमसे मिलूंगा ।।
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| सीताराम चौहान पथिक |


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