बुधवार, 2 दिसंबर 2020

Maa par kavita-ममता का आँचल/सीताराम चौहान पथिक

 Maa par kavita

Maa-par-kavita
ममता का आँचल



      ममता  का  आँचल


मां , मुझे इक बार ॴचल में , 

छिपा लो ----थक गया    हूं  । 

ममता भरी  लोरी सुना  दो  , 

 थपथपा  दो  ---- थक गया हूं 


तुमको देखा नहीं किन्तु अनुभव किया है , 

ममता की देवी सदा मानता हूं 

तुम्हीं गंगा यमुना सी बहती रही हो 

सदा मन से मै तो यही मानता हूं । 


झिलमिल सितारों में सब से प्रकाशित , 

सितारा तुम्हें मानता आ रहा हूं ,

सुख - दुःख निजी इनसे बांटे हैं मैंने , 

सितारों को मां मानता आ रहा हूं ।  


परमात्मा में भी , मां तुम छिपी हो , 

प्रकॄति ने भी ममता तुम्हीं से है पाई । 

विमुख हो गया था - मैं जब दुधमुंहा था , 

दादी का ले रूप - ममता लुटाई । 


विमुख आज भी हूं मैं अपने सगो से , 

फिर भी कर्तव्य की डोर थामे खड़ा हूं । 

मेरे आज अपने पराए से लगते , 

है जीवन यही -अग्निपथ पर खड़ा हूं । 


अभिमन्यु सा बनके मैं रह गया हूं , 

संघर्ष रत हूं निजी चक्रव्यूह में  

कवच अपनी आशीष का - मुझको दे दो , 

विजयी बन सकूं - इस विषम चक्रव्यूह में । 


मां , तुम जहां भी हो - आशीष देना , 

भंवर में फंसा हूं - किनारे लगाना । 

भटकता हुआ भीष्म हूं मैं तुम्हारा , 

अमिय - बूंद  देकर अमरता जगाना । 


मां, अपने ॴचल में - दो पल सुला लो , 

स्नेह- ऊर्जा तुमसे मैं पा सकूंगा । 

जो दायित्व आधे - अधूरे बचे हैं , 

पथिक पूर्ण करके मैं - तुमसे मिलूंगा ।। 

Maa- par -kavita
 सीताराम चौहान पथिक

 


    

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

सभी साथियों से अनुरोध है कि यदि आपकी मातृभाषा हिंदी है,
तो यहाँ अपनी टिप्पणी भी हिंदी (देवनागरी लिपि)
में ही प्रकाशित करने की कृपा कीजिए!
टिप्पणी पोस्ट करने से पहले
ई-मेल के द्वारा सदस्यता ले लिया कीजिए,
ताकि आपकी टिप्पणी प्रकाशित होने के बाद में यहाँ होनेवाली चर्चा का पता भी आपको चलता रहे और आप बराबर चर्चा में शामिल रह सकें!