बुधवार, 2 दिसंबर 2020

sunaharee bhor kee or kaavy sangrah/सुनहरी भोर की ओर:काव्य संग्रह समीक्षक शत्रुध्न सिंह चौहान

 sunaharee bhor kee or:kaavy sangrah

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शत्रुध्न सिंह चौहान

सुनहरी भोर की ओर:काव्य संग्रह समीक्षक शत्रुध्न सिंह चौहान



डॉ० रसिक किशोर सिंह 'नीरज' की सुनहरी भोर की ओर सद्यः प्रकाशित लोकर्पित कृति की कल्पनाओं का मूर्तरूप है तथा कृति का आवरण चित्र पुस्तक के नामकरण के अनुरूप है मुद्रण और प्रकाशन में कोई त्रुटि नहीं है इसके लिए कवि डॉ0 नीरज और प्रकाशक को बधाई। उक्त काव्य संग्रह में कविता,गजल,मुक्तक, नवगीत, बरवै, बालगीत,त्रिशूल,छंद संग्रहीत हैं। सभी रचनायें दूध के लड्डू के सदृश्य स्वादिष्ट एवं आत्मतोष उत्पन्न करती हैं दूध के लड्डू की विशेषता होती है कि वे टेढ़े मेढ़े भी वही स्वाद देते हैं सुनहरी भोर की ओर शीर्षक आशावादी दृष्टिकोण का द्योतक है। उनकी रचनाओं के विभिन्न प्रसंग इसी भावना को लेकर जीवंत हैं। कवि ने मंगलाशा की है :--

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आश और आशीष लिये फिर

नव प्रभात नीरज खिल जाये

जीवन उपवन सुर्भित हो नित

मंजुल यश चहुँदिशि फैलाये।

कवि ऐसा शिल्पी है जो वर्तमान के यथार्थ अतीत के वैभव एवं भविष्य के सुनहरे सपनों को लेकर भाव यात्रा करता है। अपनी स्वयं की जीवन यात्रा के खट्टे मीठे अनुभवों को लेकर जगत व्यापी घटनाओं परिदृश्यों के साथ व्यापक बन जाता है प्रकृति संस्लिष्ट स्वरूप उसकी प्ररेणा का श्रोत हैं यथा पर्वत कविता से है :-- :

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पर्वत पहाड़ झरने

सबकी सुनती

सबको गुनती

धरती तुम सबकी

विधाता हो/ जन्मदाता हो

तुममें है शब्द,रस

गंध, स्पर्श और तेज

प्रेम और जीवन से लवरेज।

प्रेम और जीवन से लवरेज।

गंगा मइया के माध्यम से कवि नें पर्यावरण प्रदूषण से मुक्त कराने का आग्रह किया

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जल स्त्रोतों को सभी खोलकर

जल से गहराई भर दो

जल का पर्यावरण प्रदूषण

हो रहा दिन प्रतिदिन भारी

संकट दूर करो जगती का

नीरज तब होगा शुभकारी।

भाव पक्ष सुदृढ़ हैकाव्य शैली के वाह्य रूप तो प्रथक-प्रथक हैं किन्तु उनकी संवेदना का स्तर गगन चुम्बी है। गेयता की प्रबलता है सस्वर पाठकर सभी आनन्द ले सकते हैं भाव चित्र जो गढ़े गये हैं पाठक के हृदय में समरसता स्थापित करते हैं।

वो चाँद सा रहता है सदा आसमान में

पर वह कौमदी के लिये, रहता करीब है

_पर वह कौमदी के लिये, रहता करीब है कवि बड़े ही दार्शनिक भाव में डूब कर सत्यम शिवम् सुन्दरम का अन्वेषण करता हुआ योगिक मुद्रा में समाधिष्ट हो जाता है तभी तो उनकी कविता तीर्थ स्थल बन गई है

नव दृव्य यहीं

पृथ्वी जल में

है तेज, वायु, आकाश

काल दिक, मन, आत्मा

ज्योति-पुञ्ज -प्रकाश।

ज्योति-पुञ्ज -प्रकाश। कवि की रचना धर्मिता, सृजनात्मक, कलात्मक एवं मानवीय सम्वेदना के धरातल पर खड़ी है कृति की भूमिका लिखते हुये उसके सम्पादक शिवकुमार शिव एवं आमुख में आर्शीवाद देते हुये गीतानंद गिरि जी ने इसे स्वीकारा है।

डॉ0 नीरज की इस कृति को शीर्ष सम्मान प्राप्त होना चाहिए यह मेरी मंगल कामना है। यद्यपि यह नीरज का कोई नया अवतरण नहीं है इसके पूर्व भी उनकी अनेकों रचनायें (कृतियाँ) प्रकाशित हो चुकी हैं। ये बाँदा की धरती के रत्न हैं अवध क्षेत्र में रहकर इन्हें ख्याति प्राप्त हो रही है। यह राजकीय सेवा के दायित्वों का निर्वहन करते हुये साहित्य सेवा में रचे बसे रहते हैं

सहजता का नाम नीरज है

सुगमता का नाम नीरज है

उमंगो के साथ जीतें हैं

बहारों का नाम नीरज है

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