शुक्रवार, 27 नवंबर 2020

sampoornaand mishr kee kavita chakravyooh - सम्पूर्णान्द मिश्र की कविता चक्रव्यूह

 sampoornaand mishr  kee kavita chakravyooh 

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image source by wikipedia

चक्रव्यूह
 

 बहुरूपिया होता है मन

      छलावे में

 नहीं आना चाहिए

 बनाना होगा दास इसको

तभी मिल सकती है

 इंद्रियों पर विजय

 बहुत कठिन होता है

   नियंत्रण इस पर

 भटका देता है यह मनुष्य को

  विषय- वासनाओं के जाल में

      बहुत गहरी होती है

  काम, क्रोध लोभ की सरिता

बहा ले जाती है बहुत दूर तक

    जहां शिनाख़्त

 मिटा देता है आदमी अपना

 वास्तविक चेहरा नहीं देख

पाता है आत्मा के दर्पण में

नहीं निकल पाता है

 मोह के चक्रव्यूह से

 साधना की ज़रूरत होती है

 मन को बांधने के लिए अनवरत

मन को भी समझना होगा

 विषय की सत्यता को

  नहीं तो यह डुबो देगा

अंधकार के इस भवसागर में

 सत्य माने बैठे हैं जिसको हम

वह तो केवल छलावा है

आंखों का लोभ लुभावन भ्रम है

 नियंत्रण चाहते हैं

 यदि इंद्रिय रूपी घोड़े पर

तो मन के सारथी को

समझना होगा बहुत शिद्दत से

जगत की नश्वरता को

पढ़े कविताएं : पिता पर कविता 


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लेखक के बारे मे जाने 

 संपूर्णानंद मिश्र

प्रयागराज फूलपुर

7458994874

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1 टिप्पणी:

  1. आप एक महान कवि हैं आपकी तारीफ़ शब्दों में बयां नहीं कि है सकती। सादर चरण स्पर्श है आपको🙏

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