jeevanadaayinee saansen
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जीवनदायिनी सांसें
विवेक की चलनी में
चल जाती है जब बुद्धि
तब मनुष्य अनैतिकता की
ज़हरीली हवा से
विमुक्त होकर
नैतिकता की
किताब पढ़ने लगता है
और वह उस दिन
सचमुच एक पूंछविहीन
जानवर की सफ़ से
असंपृक्त होकर
धर्म, जाति, भाषा, साम्प्रदायिकता
की उदधि से बचाता है
लोगों को डूबने से
और भरता है
उनमें निरंतर सकारात्मक सोच की जीवनदायिनी सांसें
क्योंकि विशुद्ध बुद्धिवाद का पथ
अहंकार के घोर घुप्प अंधेरी
वीथिकाओं से होकर
आतंक और विनाश के अरण्य तक ही जाता है
जहां दूसरों के सुख
के पंक में
मनुष्य ईर्ष्या एवं द्वेष
का पत्थर फेंकता है
ताकि वह सुखा सके फैले हुए
अपने चरित्र की स्याही को
और अपने को
स्वघोषित कर दे कि
मैं आज भी हूं
एक विशाल बरगद
जिसकी छाया में
आज भी न जाने कितने
भटके हुए पथिक
मिटाते हैं आज भी
थकान अपनी
पढ़े: गोधूलि
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*सम्पूर्णानंद मिश्र*
*प्रयागराज फूलपुर*
*7458994874*
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