deep bankar jalo
दीप बनकर
जलो इस कदर,
तम धरा
पर कहीं रह
न जाये,
नीर बनकर
बहो इस तरह,
प्यास से कोई
मरने न पाये,
दीप बनकर
जलो इस कदर,
तम धरा
पर कहीं रह
न जाये।। १।।
जाम पर
जाम छलके मगर,
प्यास अविराम बढती
गई,
तृप्ति की बूँद
पाई नहीं,
रेत
ही रेत मिलती
गई,
वो ढलाने
उतरने से क्या,
लडखडा
कर जहाँ जान
जाये,
दीप बनकर
जलो इस कदर,
तम धरा
पर कहीं रह
न जाये।।२।।
तुम किसी
का सहारा बनो,
या नदी
का किनारा बनो,
बीच मजधार
में जो फंसे,
बन हवा
तुम सहारा बनो,
कोई अरविंद
अंजान नौका,
बीच नदिया
में ना डूब
जाये,
दीप बनकर
जलो इस कदर,
तम
धरा पर कहीं
रह न जाये।।
३।।
 |
| अरविन्द जायसवाल |
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