मंगलवार, 24 नवंबर 2020

With nida fazli- निदा फाज़ली के साथ - आशा शैली

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निदा फाज़ली के साथ(With nida fazli)
 


किसी ने बताया, आज निदा फाज़ली का जन्मदिन है। मुझे कपूरथला के मुशायरे के वे दो दिन याद गए सन् तो याद नहीं पर उन दिनों वहाँ पंजाबी में दोबारा हीर लिखनेवाले लेखक ज्ञानसिंह संधु मजिस्ट्रेट थे। वे पंजाब में जहाँ भी रहे उन्होंने मुशायरे जरूर करवाये। उनकी संस्था साहित्य मंच जालंधर की मैं हिमाचल इकाई की सचिव थी। इसके अध्यक्ष जालंधर दूरदर्शन के समाचार सम्पादक श्री जे सी वैद्य (जगदीश चन्द्र) जी थे। संस्था के बैनर तले साल में दो या कभी तीन मुशायरे भी हो जाते और इन मुशायरों में देश के नामी शायर भाग लेते। हिमाचल की सचिव के नाते मेरा रहना जरूरी था। इस योजना में जगराओं, भोगा, लुधियाना, जलन्धर, होशियारपुर, मलेरकोटला वगैरह सभी जगह मुशायरे होते और वहाँ के शायरों के मध्य मैं भी होती। इस बार संधु जी कपूरथला में थे तो मुशायरा वहीं होना था। दूर के शायरों को समय पर अपनी गाड़ियों के हिसाब से पहुँचना था। बशीर बद्र को भोपाल से आना था और निदा फाज़ली साहब को बम्बई से। ये दोनों पहली शाम को पहुँच गए। व्यवस्था के लिए मैं और श्रीमती संधु दो ही महिलाएं थीं। हाँ निदा फ़ाज़ली के साथ एक शायरा और भी थी जिनका नाम याद नहीं रहा।

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अब श्रीमती संधु की सहायता तो मुझे ही करनी थी। रात के भोजन के बाद ज्ञान सिंह संधु, उनकी पत्नी, प्रोफेसर मेहर गेरा, आधा पुल और ज़मीन के लेखक जगदीश चन्द,जिन्हें हम सब वैद्य जी कहते थे और संस्था के अन्य सदस्य, जब सब लोग बैठे तो निदा फाजली को पता चला कि मैं भी कलम चलाती हूँ तो उन्होंने केवल बड़े ध्यान से मुझे सुना, बल्कि मेरे गुरू प्रो मेहर गेरा, (जो वहीं उपस्थित थे) से मेरे अशआर पर बात भी की। मुझे कहीं नहीं लगा कि वे फिल्मी दुनिया के बड़े शायर हैं। सुनते सुनाते रात आधी बीत गई तब कहीं सोने की बारी आई दूसरे दिन पठानकोट से राजेन्द्र नाथ रहबर, आज़ाद गुलाटी, (इनका शहर याद नहीं), होशियारपुर से प्रेम कुमार नज़र, कुछ लोग मलेरकोटला के और भी बहुत सारे नामी गिरामी शायर आये। पर निदा फ़ाज़ली कहीं भी अलग से नहीं लगे। कैमरे का ज़माना था, फोटो ग्राफर ने फ़ोटो भी खूब लिए, पर मेरी ज़िन्दगी की उठा पटक में बहुत कुछ खो गया है साहब। वैद्य जी, प्रोफेसर मेहर गेरा और निदा फाजली भी चले गए। ज्ञान सिंह संधु सेवानिवृत्त होकर सुना था मुहाली बस गए थे। पता नहीं अब कहाँ हैं पर यादें तो साथ हैं

जब वह पाकिस्तान गए तो एक मुशायरे के बाद कट्टरपंथी मुल्लाओं ने उनका घेराव कर लिया और उनके लिखे शेर -

घर से मस्जिद है बड़ी दूर, चलो ये कर लें।

किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए॥

पर अपना विरोध प्रकट करते हुए उनसे पूछा कि क्या निदा किसी बच्चे को अल्लाह से बड़ा समझते हैं? निदा ने उत्तर दिया कि मैं केवल इतना जानता हूँ कि मस्जिद इंसान के हाथ बनाते हैं जबकि बच्चे को अल्लाह अपने हाथों से बनाता है।
उनकी एक ही बेटी है जिसका नाम तहरीर है।
With nida fazli
 आशा शैली


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