phir rakt nahee vo paanee hai
फिर रक्त नही वो पानी है।
होता हैं सागर अति गंभीर
फिर भी सूनामी आती है।
कल कल करने वाली सरिता
वर्षा ऋतु मे उफनाती है।
पर्वत हैं कितने अटल अचल
फिर भी वे टूटा करते है।
शीतल मेघों के भीतर से
विद्दुत शर छूटा करते हैं।
ये प्यारी धरती हरी भरी
ममता की देवी कहलाती।
लेकिन जब होती है विक्षुब्द
भूकम्पों से ये दहलाती।
अन्याय अनय के तीरों को
सहने की भी मर्यादा है।
अति से भी अति जब हो जाय
फिर लड़ने मे क्या बाधा है।
अधिकार छीन कर यदि कोई
जब मन्द मन्द मुस्काता हो।
वह कोई हो, है परम शत्रु
सहचर अनुचर या भ्राता हो।
जो निष्ठुर निर्मम कटु कठोर
उनके विरुद्ध कर शब्द घोर।
बज उठे नगाड़े जोर जोर
जागे जवान कल के किशोर।
अ नयी को देना क्षमा दान
ये दया नही कायरता है।
तू खुद को चाहे जो समझे
जग यही कहेगा डरता है।
जब अपने प्रति अन्यायी को
कुदरत भी क्षमा नही करती।
तू कौन है तेरा नाम है क्या
देवों से दिव्य तेरी हस्ती?
तू किस सेना का नायक है
तू किस गुरु का है शिष्य भिन्न।
प्रत्यक्ष देख रिपु का तांडव
उठती न पीर होता न खिन्न।
हो गया लहू तेरा ठंडा
क्या तेरी क्षद्म जवानी है।
जो अनयी पर भी न खौले
फिर रक्त नही वो पानी है।
ये अपने हैं यह बात न कर
जो भी कृतघ्न वह द्रोही है ।
जो भी अधर्म के साथ चले
वो पामर है विद्रोही है ।
उठ जाग सिंह के हे वंशज
तू सुना शत्रु को फिर दहाड़।
लहरें द्रुत गति से चढ़े गगन
सागर उछले टूटे पहाड़ ।
अरिदल मे हाहाकार मचे
बैरी का कट कट दर्प गिरे।
जनमेजय तब तक यज्ञ चले
जब तक कुंडों मे सर्प गिरे।
विकराल हो गईं स्थितियां
परिवर्तन बहुत जरूरी है।
इन आस्तीन के सांपो का
आमर्दन बहुत जरूरी है
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| सृष्टि कुमार श्रीवास्तव |
सृष्टि कुमार श्रीवास्तव
हमें विश्वास है कि हमारे लेखक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस वरिष्ठ सम्मानित लेखक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।लेखक की बिना आज्ञा के रचना को पुनः प्रकाशित’ करना क़ानूनी अपराध है |आपकी रचनात्मकता को हिंदीरचनाकार देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए help@hindirachnakar.in सम्पर्क कर सकते है|whatsapp के माद्यम से रचना भेजने के लिए 91 94540 02444, संपर्क कर कर सकते है।
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अति उत्तम। ओजपूर्ण। कवि को साधुवाद।
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