बुधवार, 4 नवंबर 2020

Kalpesh ke dohe -भरे हृदय आनंद

Kalpesh ke dohe

       

Kalpnesh-ke-dohe

   

  भरे हृदय आनंद

दोहे


यह प्रभात का दृश्य है, भरे हृदय आनंद, 

प्राची में तारा चमक,पश्चिम चाँद अमंद।


शाँत चतुर्दिक् प्रकृति  है,मृदुल भाव विस्तार, 

निशा विदा वेला निकट,इस विभात के द्वार। 


उतर चाँद गिरि शृंग पर,लगता बहुत ललाम,

नत हो जैसे चाहता, भू को करे प्रणाम, 


प्राची का तारा चढ़ा, चला शीर्ष  की ओर,

लगता अनुभव कर रहा,होने को है भोर।


प्रथम दिवस कार्तिक प्रभा,नभ नीला अब पूर्ण, 

कालिंदी स्नान का,बजा चतुर्दिक् तूर्ण।


तुलसी के चौरा जले,प्रातः सायं दीप,

मणि मौक्तिक के दिवस ये,उदर पालती सीप।


आने को दीपावली,धन तेरस का पर्व, 

जन-जन में जागृत हुआ, अनुपम वेद अथर्व। 


दिन-दिन होता मंद रवि,बढ़े ठंड का जोर, 

सुखद रजाई के दिवस, गाँव नगर में शोर। 


धान कटे घर आ रहे,होता कृषक विभोर,

कार्तिक का चेहरा चटक, लाया पर्व अथोर।


बाबा कल्पनेश

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