Kalpesh ke dohe
भरे हृदय आनंद
दोहे
यह प्रभात का दृश्य है, भरे हृदय आनंद,
प्राची में तारा चमक,पश्चिम चाँद अमंद।
शाँत चतुर्दिक् प्रकृति है,मृदुल भाव विस्तार,
निशा विदा वेला निकट,इस विभात के द्वार।
उतर चाँद गिरि शृंग पर,लगता बहुत ललाम,
नत हो जैसे चाहता, भू को करे प्रणाम,
प्राची का तारा चढ़ा, चला शीर्ष की ओर,
लगता अनुभव कर रहा,होने को है भोर।
प्रथम दिवस कार्तिक प्रभा,नभ नीला अब पूर्ण,
कालिंदी स्नान का,बजा चतुर्दिक् तूर्ण।
तुलसी के चौरा जले,प्रातः सायं दीप,
मणि मौक्तिक के दिवस ये,उदर पालती सीप।
आने को दीपावली,धन तेरस का पर्व,
जन-जन में जागृत हुआ, अनुपम वेद अथर्व।
दिन-दिन होता मंद रवि,बढ़े ठंड का जोर,
सुखद रजाई के दिवस, गाँव नगर में शोर।
धान कटे घर आ रहे,होता कृषक विभोर,
कार्तिक का चेहरा चटक, लाया पर्व अथोर।
बाबा कल्पनेश
हमें विश्वास है कि हमारे लेखक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस वरिष्ठ सम्मानित लेखक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।लेखक की बिना आज्ञा के रचना को पुनः प्रकाशित’ करना क़ानूनी अपराध है |आपकी रचनात्मकता को हिंदीरचनाकार देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए help@hindirachnakar.in सम्पर्क कर सकते है|whatsapp के माद्यम से रचना भेजने के लिए 91 94540 02444, संपर्क कर कर सकते है।
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