रविवार, 6 दिसंबर 2020

kavita khilaaf hai jhooth-ख़िलाफ़ है झूठ/ सम्पूर्णानंद मिश्र

kavita khilaaf hai jhooth

kavita- khilaaf- hai- jhooth


ख़िलाफ़ है झूठ

 

 

फल है

तुम्हारी निरंतर साधना का

मिला है जिस वजह से

नाम तुम्हें यह सच का

घबराते हैं तुम्हारी प्रखरता से

झूठ के अनीक भी

नहीं निमज्जित हो सकते हैं

ये तुम्हारी अर्चियों में

इसलिए

 ख़िलाफ़ है

 झूठ मुखर होकर

पूरी प्रतिबद्धता से तुम्हारे

चाहता है रौंदना तुम्हें

मुट्ठी भर बिके रोशनियों के बूते  

जलने के लिए

अनवरत तेल पिया होगा

 जिसके मुंह ने

तुम वही तो हो

लेकिन नहीं

जल सकते झूठ के दीपक

  छद्म उजाले आज

 सारथी हो झूठ के तुम

 कर रहे थे

दावा कल तक कि

खड़े हो तुम साथ सच के

दे रहे थे दुहाई मित्रता की

 आने लगी है

लोभ की दुर्गंध

तुम्हारी देह से

नहीं हो सकते

मित्र तुम किसी के

मित्रता की गढ़ी है

 परिभाषा अगर किसी ने

तो वह केवल द्वापर में

कृष्ण और कर्ण के द्वारा

उड़ने लगे

 पंख लोभ के जब

नहीं हो सकती है

मित्रता की आयु लंबी

  उखड़ जाता है

 खूंटा मित्रता का

 विश्वास का

अनैतिकता का

 झूठ का

फरेब का

क्योंकि झूठ

 सच के गर्भ में

नहीं रह सकता है

बहुत दिनों तक ज़िंदा

ख़िलाफ़ है आज झूठ

मुखर होकर सच के

kavita -khilaaf- hai- jhooth
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