narendra singh baghel ka geet
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| नरेन्द्र सिंह बघेल का गीत |
कितनी रातें छली गयीं
कितने दर्द छुपाए दिल में, कितनी रातें चली गयीं।
अलसाये अनुबंधों से फिर, कितनी रातें छली गयीं।।
हमने जीवन में देखा था,
सुंदर सपन सलोना सा।
फूटें निर्झर प्रेम-पाश के,
महके कोना-कोना सा ।।
प्यार प्यास की ज्यों चातक सी, तकती ऋतुयें चली गयीं।
अलसाये अनुबंधों से फिर, कितनी रातें छली गयीं ।।
उनकी खट्टी -मीठी यादें,
रोज सपन में आती हैं ।
सो जाता है जग जब सारा,
सात सुरों में गाती हैं ।।
टूटे सपन सलोने जैसे, स्वाति बूंद सी चली गयीं ।
अलसाये अनुबंधों से फिर, कितनी रातें हैं छली गयीं।।
दर्द समेटे अंतर्मन में,
हम गुमसुम से बैठे रे।
हुआ प्रवासी मन है उसका,
शायद वापस लौटे रे ।।
नई उम्मीदें नई कल्पना, आती-जाती चली गयीं।
अलसाये अनुबंधों से फिर, कितनी रातें छली गयीं।
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| नरेन्द्र सिंह बघेल |


बहुत सूंदर रचना
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