insaan ek bulabula
इन्सान --एक बुलबुला
इन्सान - क्या है ॽ
पानी का
एक बुलबुला ।
घमंड इतना भरा
,
जैसे खुद हो खुदा
।
वक्त से
डर , हे इन्सान
वक्त है - शहंशाह ।
इसने ना
जाने कितने सिकंदर
फनाह किए
, जिनका ना कोई निशान
।
इन्सान , खुद को
पहचान
कठपुतली है तू ,
है
डोर से बंधा ।
तेरी हर
हरक़त पे है
उसकी नज़र ,
नीचे ना
तू ऊपर ,
है
बीच में टंगा ।।
जवानी के नशे में
,
अंधा ना बन पागल
।
कल
बुढ़ापा भी आएगा
,
नशा
काफूर हो
जाएगा ।
घड़ी में
वक्त है तेरा
भी लिखा
नशे
में तुझको
नहीं दिखा
।
भुला दे नादानियां अपनी
इसी में है तेरा भला
।।
फैसला तुझको
करना है अब
,
मालिक का
दर है खुला
।
आंसुओ से रंग
दे चौखट उसकी
,
क्योंकि पथिक , तू
है एक
मात्र पानी का है
बुलबुला ।।
 |
| सीताराम चौहान पथिक |
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