शनिवार, 12 दिसंबर 2020

insaan ek bulabula इन्सान --एक बुलबुला/ सीताराम चौहान पथिक

  insaan ek bulabula

इन्सान --एक बुलबुला 

 

insaan-ek- bulabula

इन्सान - क्या  है

पानी का एक बुलबुला

घमंड  इतना  भरा ,

जैसे  खुद  हो  खुदा

वक्त से डर , हे इन्सान

वक्त  है  - शहंशाह  

इसने ना जाने कितने सिकंदर

फनाह किए , जिनका ना कोई  निशान   

 

इन्सान ,  खुद  को पहचान

कठपुतली है तू  ,

है  डोर  से  बंधा 

तेरी हर हरक़त पे है उसकी नज़र ,

नीचे ना तू ऊपर ,

है  बीच  में  टंगा  ।।

 

जवानी के  नशे में ,

अंधा  ना  बन  पागल

कल  बुढ़ापा  भी  आएगा ,

नशा  काफूर  हो जाएगा 

 

घड़ी में वक्त है तेरा भी लिखा

नशे  में  तुझको नहीं  दिखा

भुला  दे  नादानियां  अपनी

इसी में  है  तेरा  भला ।।

 

 फैसला  तुझको करना है अब ,

 मालिक  का दर  है  खुला

आंसुओ से रंग दे चौखट उसकी ,

क्योंकि पथिक , तू है  एक

मात्र पानी का  है बुलबुला ।।

 

insaan- ek- bulabula
सीताराम चौहान पथिक

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