man kee laharen
मन की लहरें
मन की लहरें जब तन के तट से टकराती हैं,
फौलादी तन तिल-तिल कर मरता जाता है।
सवालों की आंधियां चलती हैं
जवाबों के वृक्ष उखड़ जाते हैं
हृदयाकाश में अशांति छा जाती है
चट्टान सा सीना न सह पाने से टूटता जाता है।
मन की लहरें जब तन के तट से टकराती हैं,
फौलादी तन तिल-तिल कर मरता जाता है।
हाथ जब बढ़ते हैं आगे तो कदम रुक जाते
मेल नहीं रहता कदमों में, स्वयं टकराते
अंगों का अंगों से संतुलन और..
मन का तन से समन्वय चुकता जाता है।
मन की लहरें जब तन के तट से टकराती हैं,
फौलादी तन तिल-तिल कर मरता जाता है।
थक चुकी आँखे सोना चाहती हैं किन्तु
जिद्दी मन सारी रात जगाता है,
उर के सागर में उथल-पुथल मचती किन्तु
कह नहीं पाते कुछ भी,स्वर डूबता जाता है।
मन की लहरें जब तन के तट से टकराती हैं,
फौलादी तन तिल-तिल कर मरता जाता है।
अतीत बन कर मेघ छा जाता है कभी,
भवितव्यता की विद्युत रह-रह कर कौंध जाती है ।
उमड़-घुमड़ होती है खूब किन्तु,
फैसलों की बारिश नहीं होती
संशय की रातों में जीवन कटता जाता है।
मन की लहरें जब तन के तट से टकराती हैं,
फौलादी तन तिल-तिल कर मरता जाता है।
टूटते मन की इस अंतर्कलह में
लहूलुहान हो जाते अंग सारे
टीस उठती है दर्द के नील उभर आते हैं
मन के अंगारों पर तन का ताप बढ़ता जाता है।
मन की लहरें जब तन के तट से टकराती हैं,
फौलादी तन तिल-तिल कर मरता जाता है।
संसार क्या जाने मन पर क्या बीत रही
उपहास उड़ाना उसकी निर्मम रीत रही
बाहर-भीतर के इन व्यर्थ के झगड़ो में
होकर अकेला मानव पुष्प सा मुरझाता जाता है।
मन की लहरें जब तन के तट से टकराती हैं,
फौलादी तन तिल-तिल कर मरता जाता है।
मन तो आवारा है कब किसकी सुनता है
जो लगे उसको अच्छा बस वही राह चुनता है
अनियंत्रित मन की चाह बुरी औ राह बुरी
चुपके-चुपके दुखों का जाल बुनता जाता है।
मन की लहरें जब तन के तट से टकराती हैं,
फौलादी तन तिल-तिल कर मरता जाता है।
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| शैलेन्द्र कुमार |
शैलेन्द्र कुमार
ग्राम व पोस्ट राही, जिला रायबरेली।
मोबाइल नंबर 7398356812
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