गुरुवार, 5 नवंबर 2020

वॄद्ध और सूखा ठूऺठ- vrddh aur sookha thooth

vrddh aur sookha thooth

vrddh- aur -sookha -thooth
वॄद्ध और सूखा ठूऺठ




       

   वॄद्ध और सूखा ठूऺठ ।। 


वॄक्ष ठूऺठ हो गया ,

और पऺछी उड़ गए ।

कारवॖऻ गुजर  गया , 

किस्से पुराने जुड़ गए । 


वॄक्ष जब जवान था , 

पऺछियो की शान था । 

बटोहियों के काफिले , 

बऻसुरी  की  तान  था । 


वॄक्ष था  हरा - भरा , 

आम थे यूं टपकते ।

बच्चे - बड़े - बूढ़े सभी , 

बच्चे बन कर लपकते । 


घने पत्ते और तनों में , 

पक्षियों  का  वास  था । 

फड़फड़ाते  गुटर - - गूं , 

सौ  वर्ष का इतिहास था । 


विकास की  आंधी  चली , 

प्रदूषण का दम - घोंटू धुआं । 

फूल - फल सब झड़ गए  , 

जल - हीन पोखर और कुआं । 


वन कट गये - बस्ती  बस्ती , 

अब पेड़ वह , ठूऺठा  तना  । 

सड़क  के  उस  छोर पर  , 

 उपेक्षित  और   अनमना  । 


वॄद्ध की और  ठूऺठ   की  , 

गति एक सी- सुन लो पथिक। 

दोनों तिरस्कृत  समय  के    , 

अब क्या कहूं इससे  अधिक  । 

vrddh -aur -sookha- thooth
   सीताराम चौहान पथिक

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