Diwali 2020
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| सृजन करें प्रकाश,फैलाएँ उजियारा। |
दीपावली मनाने का कारण
सनातन धर्म के पावन पर्व और धार्मिक मान्यताएँ जीवन में ऊर्जा,हर्ष,उत्साह सद्भावना आदि मानवीय संवेदनाओं की संवाहक ही नहीं अपितु;सृष्टि की संरक्षक प्रणाली का भी निर्वहन करती हैं। ये मान्यताएँ नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करके सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बनाए रखती हैं।प्रत्येक मान्यता के पीछे मात्र आध्यात्मिक कारण ही नहीं बल्कि;वैज्ञानिक कारण भी हैं।
हमारे त्यौहारों और उनसे जुड़ी मान्यताओं का गहन अध्ययन करने पर हम स्वतः ही विज्ञान के मूल में पहुँच जाते हैं ।
भारत का प्राचीन विज्ञान कितना अधिक विकसित,समृद्ध और ज्ञानपूर्ण रहा होगा यह ध्यान करके ही हम आश्चर्य और गर्व के भाव से अभिभूत हो उठते हैं ।
सनातन धर्म की गौरव पूर्ण परम्परा का संवाहक बन हम वस्तुतः सृष्टि के ही संवाहक बनते हैं।
चाहे वह मन्त्रोच्चारण, हवन-पूजन,घूप-दीप ,नैवेद्य,फूल-माला,चन्दन- रोली,इत्र,तोरण और नवीन वस्त्र इत्यादि ही हों।
इन सब वस्तुओं के संयोजन में भी वैज्ञानिक तथ्य हैं ।
इन सारी वस्तुओं के एक साथ संयोजन और प्रयोग से हम जिस आनन्द से पूर्ण ऊर्जा तथा समरसता और एकाग्रता को ग्रहण कर पाते हैं उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
दीपावली मनाने का तरीका
ऐसे ही त्यौहारों की श्रृंखला में है नवरात्रि , दशहरा के पश्चात् शरद ऋतु में प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला यह पर्व असत्य पर सत्य की विजय कर वापस लौटने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभुश्रीरामजी की विजय और हर्षोल्लास का पावन प्रकाश पर्व 'दीपावली'श्री लक्ष्मीजी-गणेशजी एवं श्री कुबेर जी पूजन और दीपों की श्रृंखला का यह त्योहार ।
ईश्वर के आगमन की ख़ुशी में सजावट करना और दीये जलाना अर्थात् खुशियाँ मनाना ।
साथ ही साथ नकारात्मक शक्तियों का नाश।
वर्षा ऋतु के पश्चात् उत्पन्न कीट- पतंगों और अनगिनत कीटाणुओं को नष्ट करने में सक्षम और दीपों से उत्सर्जित सकारात्मक ऊर्जा।
अन्धकार पर प्रकाश की विजय का श्रेष्ठ उदाहरण है।
पूजा-पाठ में प्रयुक्त सामग्री ,वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित शब्द संयोजनों से उच्चारित मन्त्र हममें स्वतः ही स्फूर्ति भर देते हैं।
पवित्र और मनमोहक सुगन्ध हमारे मन को सन्तोष और सुखद अनुभूति प्रदान करती है।
दीपावली 2020 संदेश
घोर अँधियारी अमावस्या की रात्रि दीपावली का प्रकाश पर्व हमें यह सन्देश देता है कि;अन्धकार कितना भी गहन हो दीपकों का प्रकाश उससे भी टकराता है और अपना पूर्ण प्रकाश धरती पर फैलाकर अपनी आभा,ऊर्जा तथा शक्ति का आभास कराता हमें जीवन जीने की कला सिखाता है वहीं आतिशबाज़ी क्षणभंगुर जीवन का।
आधुनिकता के साथ-साथ हमारी जीवन शैली में बदलाव भले ही आया हो किन्तु;कुछ वस्तुएँ और मान्यताएँ हमारी परम्परा बनकर हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग बन गई हैं।
हम पुनः प्रकृति की ओर लौट रहे हैं यह सुखद संकेत है।
विद्युत् झालरों के स्थान पर मिट्टी के दीये जलाना,कृत्रिम फूल-पत्तियों के स्थान पर आम,अशोक आदि के पत्तों का वन्दनवार और प्राकृतिक फूलों का प्रयोग शुभता और प्रकृति की महत्ता दोनों का अद्भुत संयोजन बन जाता है ।
भिन्न-भिन्न रंगों का अनोखा प्रयोग कर द्वार-आँगन में बनी रंगोली हमारे जीवन के विविध रंगों का प्रतीक है।
कुछ भी अनावश्यक नहीं कुछ भी आडम्बर नहीं कुछ भी अन्धविश्वास नहीं है।
हर विधि-विधान में मात्र सृजन ।
रंगोली में जीवन के रंगों का सृजन,दीपों में जीवन के प्रकाश का सृजन,धूप और फूलों में जीवन की सुगन्ध का सृजन,मिष्टान्न में जीवन की मधुरता का सृजन,मिष्टान्न के आदान-प्रदान में सम्बंधों और सद्भावना का सृजन,पूजा-पाठ में कृतज्ञता का सृजन।
आइए हम सब सृजन करें-साहस जीवनपथ के अन्धकार से टकराने का,सृष्टि के इस अद्भुत तारतम्य का, अपनी परम्पराओं और अपनी सर्जनशीलता का, हर्ष और उल्लास का,जीवन आनन्द का और चहुँ ओर प्रकाश का।
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| आरती जायसवाल |


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