मंगलवार, 3 नवंबर 2020

bhaarat kee maulikata - anekata mein ekata

 bhaarat kee maulikata - anekata mein ekata

bhaarat- kee- maulikata
असिस्टेंट प्रोफेसर, अशोक कुमार



भारत की मौलिकता : अनेकता में एकता*


   विश्वगुरु भारत विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का देश है जो सम्पूर्ण विश्व पटल में अलग पहचान रखता है। संस्कृति और भाषाएँ अलग-अलग होने के बाद भी हम एक सूत्र में बँधे हैं तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता को अक्षुण बनाये रखने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। भारत का क्षेत्रफल कश्मीर से कन्याकुमारी, गुजरात से अरुणाचल प्रदेश तक फैला है। भारत माँ के चरणों को हिन्द महासागर धुलता है तो मांथे पर हिमालय श्वेत मुकुट की भाँति सुशोभित है। भारत के अंदर प्राकृतिक खनिज संपदा, उद्योग धंधे, ज्ञानालय आदि विद्यमान हैं जिनका प्रमुख उद्देश्य देश की समृद्धता तथा एकता को बनाये रखना है।

    राष्ट्रीय एकता मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया एवं भावना है जो राष्ट्र के लोगों में भाईचारा, राष्ट्रप्रेम एवं अपनत्व का भाव प्रदर्शित करती है। विश्वपटल पर राष्ट्रीय एकता की मिशाल भारत को माना जाता है। विभिन्न संप्रदायों, जातियों के लोग जिनका खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा आदि पूरी तरह से भिन्न है फिर भी सभी लोग एक समुदाय में रहते और एक सूत्र में बंधे हुए हैं। शायद इसीलिए भारत को 'अनेकता में एकता का देश' कहा जाता है।

    किसी सभ्य समाज और लोकतांत्रिक राष्ट्र की आधारशिला नागरिकों में लिंग, धर्म, जाति, अर्थ, शिक्षा आदि में बिना किसी भेदभाव के समान व्यवहार पर टिकी होती है। यह समाज में तार्किक तथा सामाजिक मूल्यों की स्थापना करती है। आज यह यक्ष प्रश्न है कि- विभिन्न राजनीतिक दल अपने वोट बैंक के लिए समाज में ईर्ष्या और आपसी दुश्मनी का ज़हर घोलकर एक-दूसरे को लड़वाते हुए राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। इसलिए हमें चिंतन करना होगा कि धर्म, जाति, क्षेत्रीयता आदि के नाम पर देश को बँटने से कैसे रोका जाए? इसके लिए हमें एक-दूसरे की संस्कृति का सम्मान करना होगा। हम अपनी लोक संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं जो शुभ संकेत है। इससे आने वाली पीढ़ियाँ विलुप्त होती संस्कृति का बोध कर सकेंगी।

    देश की रक्षा के लिए हजारों वीर क्रांतिकारियों, सैनिकों ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर राष्ट्र की रक्षा की और तिरंगा न झुकने दिया। इस बलिदान का परिणाम है कि हम अपने देश की एकता और अखंडता पर गर्व करते हैं। राष्ट्रीय एकता का अर्थ ही है- राष्ट्र के सभी घटकों के भिन्न-भिन्न विचारों में सामंजस्य और भाईचारा बनाये रखना। राष्ट्रीय एकता में विभिन्न धर्मों के होते हुए आपसी प्रेम और सद्भाव बनाये रखने में केवल शरीरिक समीपता ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि उसमें मानसिक, बौद्धिक, वैचारिक और भावात्मक निकटता की समानता भी आवश्यक है। भारत विभिन्न संस्कृतियों और संप्रदायों का संगम स्थल है। हिन्दू धर्म के अलावा जैन, बौद्ध, सिक्ख धर्म का उद्भव और विकास भी इसी देश में हुआ है। गीता, कुरान, बाइबिल गुरुग्रंथ साहिब, त्रिपटिक और जैन आगम ग्रंथों का सार यही है- सद्भाव, एकता और कर्म। इसलिए हमारा देश धर्मनिरपेक्ष है। इस तथ्य को गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस के अयोध्याकाण्ड में लिखा है-

          "करम प्रधान बिस्व करि राखा।

          जो जस करइ सो तस फलु चाखा।।

    भारत के स्वतंत्र होने के बाद की स्थिति पर गहराई से चिंतन करें तो समझा जा सकता है कि देश सिर्फ टूटा ही नहीं, धर्म जाति क्षेत्रवाद के आधार पर बंटा भी है। देश के आम जन-मानस में आपसी स्थिति यही रही तो भविष्य के परिणाम घातक हो सकते हैं। सियासतदान समय-समय पर धर्म, वंश, जाति, लिंग, क्षेत्र आदि के आधार पर लोगों को बाँटकर सत्ता का सुख भोग रहे हैं। भारत की स्थिति तो अब और भी चिंतनीय है क्योंकि 'राष्ट्रभाषा हिन्दी' को ही बंटवारे की तलवार बनाया जा रहा है।

    भारत में राष्ट्रीय एकता बनाये रखने के लिए प्रतिवर्ष 19 नवम्बर को राष्ट्रीय एकीकरण दिवस मनाया जाता है, जिससे समाज मे व्याप्त असमानता को दूर किया जा सके। भारत में एकता और अखंडता बनाये रखने के लिए महत्वपूर्ण घटक है- शिक्षा। शिक्षा के द्वारा ही देश मे फैली वैचारिक असमानता और मतभेदों को दूर किया जा सकता है। यथासम्भव गुणवत्तापरक और रोजगारपरक शिक्षा अपने बच्चों को देने का प्रयास करना चाहिए।

    जब हर भारतवासी धर्म, वंश, जाति, नस्ल, क्षेत्रीयता और आपसी वैमनस्य से ऊपर उठकर देशहित में चिंतन करेगा तभी वसुधैव कुटुम्बकम की परिकल्पना साकार होगी।

    भारत की एकता और अखंडता को सुरक्षित बनाये रखने में महिलाओं के योगदान को कमतर नहीं आंका जा सकता है। स्त्रियों के प्रति धार्मिक कट्टरता, स्त्री शोषण, लिंगभेद, अशिक्षा सबसे बड़े दोष हैं जो देश की प्रगति में बाधक हैं। सामन्तों, उननिवेसवादी ताकतों ने इसका लगातार फायदा उठाया है। भारतीय समाज में स्त्री के समाजीकरण की प्रकृति पर चिंतन करें तो कह सकते हैं कि स्त्रियां पुरुष सत्तात्मक समाज में आजीवन बंधी रहती हैं। संविधान की ही देन है कि पुरुष प्रधान देश में महिलायें अपने सामर्थ्य और परिश्रम से गाँव की पगडण्डी से लेकर संसद तक पैठ बना चुकी हैं तथा आकाश से पाताल लोक तक में अपने कदम रख चुकी हैं।

    गीतकार अंकित पडवार के माध्यम से कह सकते हैं कि-

    "हिन्द देश के निवासी, सभी जन एक हैं,

    रंग-रूप-वेश-भूषा सब चाहे अनेक हैं।

    गंगा, जमुना, ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, कावेरी,

    जाकर मिल गयीं सागर, सब हुई एक हैं।

    हिन्द देश के निवासी....



सरयू-भगवती कुंज

शिवा जी नगर (दूरभाष नगर)

रायबरेली (उप्र)

मोब. 9415951459

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6 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. धन्यवाद भाई, आप जैसे सुधी पाठकों से लेखक को ऊर्जा प्राप्त होती है

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