Maa par kavita in hindi
पाठक इस पोस्ट मे maa par kavita in hindi दुर्गा शंकर वर्मा "दुर्गेश "की रचना माँ पर साहित्यिक कविता पाठकों के सामने प्रस्तुत हैं।
०००० मां ००००
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मां धरती है,मां है अम्बर,
मां दरिया,मां सागर।
मां के बिन खाली-खाली,
रहती जीवन की गागर।
मां न होती इस दुनियां में,
जन्म नहीं हो पाता।
मां के प्यारे गीतों को,
फिर कौन यहां पर गाता।
मां ठंडी-ठंडी रातों की,
है ढकने की चादर।
मां के बिन खाली-खाली ,
रहती जीवन की गागर।
मां के बिन इस धरती की भी,
नहीं कल्पना होती।
जैसे रंगोली के बीच में,
नहीं अल्पना होती।
बच्चे अपने दु:खों को भूलें,
मां को पास में पाकर।
मां के बिन खाली-खाली,
रहती जीवन की गागर।
अपनें सिर पर कष्टों का,
वह बोझ उठाये फिरती,
हंसती रहती मुस्काती भी,
कभी नहीं कुछ कहती।
अपना पूरा जीवन करती,
वह बच्चों पे न्योछावर।
मां के बिन खाली-खाली,
रहती जीवन की गागर।
मैं "दुर्गेश" करूं यह विनती,
फिर बच्चा बन जाऊं।
उसके आंचल में छुप जाऊं,
फिर से मौज मनाऊं।
जीवन का असली सुख पाऊं,
उसकी गोद में जाकर
मां के बिन खाली-खाली,
रहती जीवन की गागर।
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| दुर्गा शंकर वर्मा "दुर्गेश" |
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