बुधवार, 25 नवंबर 2020

Best inspirational poem in hindi-हिंदी की बेहतरीन प्रेरक कविताएं-डॉ. सम्पूर्णानंद मिश्र

इस पोस्ट मे हम Best inspirational poem in hindi डॉ. सम्पूर्णानंद मिश्र वरिष्ठ प्रवक्ता हिंदी फूलपुर प्रयागराज की स्वरचित रचना पढ़ेगे। इन रचनाओं को लेखक ने युवा वर्ग को समर्पित किया हैं।
Best- inspirational- poem- hindi



वह हमारे भीतर है


ख़तरनाक हैं वे लोग 

 जो नास्तिक हैं 

विश्वास नहीं करते ईश्वर में 

उससे भी ख़तरनाक वे लोग हैं 

जो आस्तिक हैं

  विश्वास करते हैं ईश्वर पर 

  पूजते हैं उन्हें 

     माला पहनाते हैं गले में उनके 

    लेकिन वसूल लेते हैं किराया

   ईश्वर के घर तक पहुंचाने का

            न मिलने पर 

     रेत देते हैं गला आस्तिकता की

     भ्रमित कर रहे हैं इंसान को 

      ऊंचे पीढ़े पर बैठकर 

        कर रहे हैं दावा 

    ईश्वर के दर्शन कराने का

   भटक गया है अज्ञानी मानव

   भ्रंश हो गयी है बुद्धि उसकी 

  निकल पड़ा है खोजने उन्हें 

   मानों खो गया है वह 

  रहना होगा सावधान हमें 

 नास्तिक और आस्तिक दोनों से 

  भयावह हैं हमारे लिए 

     पर्दा डाल रहे हैं केवल

   ये अपने चारित्रिक अघों पर

        जो अपने को 

  आस्तिक घोषित किए हुए हैं

    सम्मिलित हैं इस घोष में

    उस अदृश्य शक्ति की मर्जी ही

  करनी होगी दुरुस्त अपनी अक्ल

   बचना होगा हम सभी को 

   इन आस्तिक धर्माचार्यों से

          क्योंकि

   ईश्वर तो है हमारे भीतर ही


 भय होना चाहिए

   होना चाहिए

   भय मृत्यु से

होना चाहिए भय सच से भी

 अनैतिक कार्यों से भी

   होना चाहिए भय 

  हर नियम विरुद्ध कार्यों से 

  तभी जी सकते हैं 

 एक मर्यादित जीवन 

 जहां भय नहीं है 

वहां जीवन नहीं है 

जहां जीवन नहीं है 

 नहीं हो सकती 

 मृत्यु भी सुंदर वहां

  उसके डर से ही 

मानव बच सकता है  

 एक बड़े अहंकार के 

   अहि- दंश से 

नहीं रहती है 

सत्ता हमेशा यहां किसी की

   गिर जाती है

 एक दिन भरभराकर

आंखों पर बंधी पट्टी 

तभी खुल सकती है 

जब हमें एहसास होता रहा 

  मृत्यु का निरंतर 

ईश्वर की करुणा की वृंत को नहीं  झकझोरना चाहिए 

सीखना चाहिए इस वैश्विक महामारी से भी 

नहीं इसी तरह 

जीते रहेंगे अकारथ जीवन

डूबते रहेंगे इस भवसागर में 

उतारना ही होगा हमें अज्ञानता के चश्में को 

अवसर दिया है

 उस अदृश्य शक्ति ने 

 एक सुंदर जीवन बनाने के लिए 

कुछ सिखाने आया ही है

यह कठिन समय

फूंक- फूंक रखना चाहिए

 एक- एक कदम इस यात्रा में

 मुश्किल जऱूर होता है 

     इस चढ़ाई में 

 लेकिन सार्थक 

और उद्देश्यपूर्ण जीने के लिए मृत्यु से भय होना ही चाहिए




 ख़तरा ज्यादा होता है


       बरतना होगा संयम

       रखना होगा धीरज 

        पीनी होगी घूंट

    आलोचनाओं की 

    रहना है शिखर पर तो 

     ख़तरा ज्यादा होता है 

          गिरने का वहां से

       ढूंढ़नी होगी जमीन अपनी 

       साधना होगा लक्ष्य अपना 

    ‌दिखाई पड़नी चाहिए केवल 

    आंखें उस चिड़िया की 

         तलाशनी होगी

       अपनी कमजोरियां

       अनगिनत गिना दें 

        दोष दूसरों के 

      नहीं बच सकते 

        ऐसा करके 

      चूक जायेंगे लक्ष्य से

     नष्ट हो जायेगा सारा प्रयास

         झांका था 

      अपने भीतर कबीर ने

      विवेक के दरीचे से 

        तब बढ़े थे

    सुधारने समाज को

   नहीं परवाह थी किसी की 

    घोषित कर दिया गया

      पागल उन्हें

    बावजूद नहीं लूटा जा सका 

    फक्कड़पन उनका 

    नशा था परिवर्तन का 

      फटकारा था 

       पाखंडियों को 

      सदियों से जिन्होंने

      रखैल बना लिया 

       धर्म और कर्म को 

      जलाया था खून 

 ‌    अपने भीतर का 

     दे सका था 

  तब रोशनी लोगों को 


     


तोड़ देती है



   टूट जाता है

 आदमी भूख के ज़्वर से 

   यह ख़तरनाक है 

    शरीर के ज़्वर  

  से बहुत ज़्यादा

   उतर जाता है 

सामान्य ज़्वर कुछ दिनों में ही 

हालांकि शरीर को

 यह भी तोड़ता है

लेकिन भूख तो

 कोमल- चित्त पर 

  हमला करता है

अंतर्मन तोड़ता है

गहरा घाव कर देता है 

दिल और दिमाग दोनों में 

    नष्ट कर देता है विवेक को

संज्ञाशून्य हो जाता है व्यक्ति 

  पार कर जाता 

     लक्ष्मण- रेखा 

अपने ही सिद्धांतों की       

मुफ़लिसी बड़े- बड़े 

साधकों को तोड़ देती है

  धर्म और अधर्म को 

  नहीं चीन्ह पाता है

 सिद्धहस्त संन्यासी भी 

 नीलाम कर देता है अपनी आत्मा को सरे-आम

    पेट की आग बुझाने के लिए

    चक्रधर जैसा ज्ञानी

 आत्मबिक्रेता हो जाता है

   चापलूसी का नर्तन

 करने लगता है दर्पी सम्राटों के 

  ईश्वर से भी ज़्यादा

 दयालु बताता है उन्हें 

मिथ्या- प्रशंसा के हथियार से   लूट लेता ऐसे नृपों को 

यह भूख सब कुछ कराती है    सामुद्रिक आग से

 भी ख़तरनाक होती है यह

 खा जाती है अपने ही अंडे को   भूखी नागिन 

  नहीं बिचार कर पाती है 

   जन्या हूं इसकी मैं ही 

कोई ब्रहृमज्ञानी 

सुदामा जैसा ही    

बचा पाता है

 अपने को इस लपट से

   नारायण की इच्छा समझ 

    संतोष कर लेता है 

चावल के एक दाने से ही 

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