शनिवार, 10 अक्टूबर 2020

reeti preeti aur bargad-अरविन्द जायसवाल

reeti preeti aur bargad-अरविन्द जायसवाल

reeti-preeti-bargad
reeti preeti bargad


रीति प्रीति

 

काश फिर रीति प्रीति बन जाये,

वही पुरवाई वही पछुवा की हवा आये।

 

चटकती धूप में पीपल की छाँव के नीचे,

आम के रस से कोई मेरे गले को सींचे

 

हर बगीचे में बसंती बयार छा जाये ,

काश फिर रीति प्रीति बन जाये ()

 

नीम की डालियों में झूलों की धमक फिर से,

रिमझिमाते हुए सावन में हो खनक फिर से।

 

धानों के खेतों में कोई गीत गुनगुना जाये ,

काश फिर रीति प्रीत बन जाये। ()

 

ज्वार की भुट्टियाँ झुक झुक सलाम करती हों,

कई गजगामिनी उन्हें देख कर मचलती हों।

 

हरी सारी का पल्लू हवा में लहराये,

काश फिर रीति प्रीति बन जाये  ()

 

गुलाबी शीत लिए क्वार के महीने में,

खुशी से झूमें गाएं गृहणियाँ करीने में।

 

खुशी अरविंद करे देहरियों पे छा जाये,

काश फिर रीति प्रीति बन जाये।()

 

: हिंदी कविता बरगद

देखो बरगद की छाया जुड़ाय रही है,

पास अपने सबै का बुलाय रही है,

 

जेठ की जब दोपहरी तपै लागिहैं,

सब पथिक पेंड़ की छाँव मा भागिहैं,

जैसे मैया ही बेनियाँ डोलाइ रही है,

देखो बरगद की छाया जुड़ाय रही है l

 

थोरी देरिया मा देहिंयाँ हरी होइ गई,

जो जरी थी तपनि मा तरी होइ गई,

 

छाँव बरगद की कैसा सोहाय रही है,

देखो बरगद की छाया जुड़ाय रही है l

जौ हुँवैं पर कहूँ पर कुआँ घाट है,

तब तो अरविंद सब ठाठ ही ठाठ है,

सबका पानी जुड़उवा पियाय रही है,

देखो बरगद की छाया जुड़ाय रही है l

reeti-preeti-bargad
अरविन्द जायसवाल

 

 


1 टिप्पणी:

सभी साथियों से अनुरोध है कि यदि आपकी मातृभाषा हिंदी है,
तो यहाँ अपनी टिप्पणी भी हिंदी (देवनागरी लिपि)
में ही प्रकाशित करने की कृपा कीजिए!
टिप्पणी पोस्ट करने से पहले
ई-मेल के द्वारा सदस्यता ले लिया कीजिए,
ताकि आपकी टिप्पणी प्रकाशित होने के बाद में यहाँ होनेवाली चर्चा का पता भी आपको चलता रहे और आप बराबर चर्चा में शामिल रह सकें!