गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

मैंने सोचा गीत लिखूँ -बाबा कल्पनेश

 मैंने सोचा गीत लिखूँ

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बाबा कल्पनेश


 

सोच
 

मैंने सोचा गीत लिखूँ पर बात नहीं बन पाई,

भाव उमड़ आए बादल से हवा चली पुरवाई।

 

कलम जहाँ पर थी बचपन में उसी बिंदु पर ठहरी,

कुछ भी कहता एक सुनती बनी कान की बहरी।

खटकिन्ने पर दौड़ लगाने में निकली है अव्वल,

जितने अक्षर सब पर चलती उर अंतर से विह्वल।

एक नये पथ पर चलने में मरती काकी-माई,

मैंने सोचा गीत लिखूँ पर बात नहीं बन पाई।

 

वही खेल बचपन के जितने अब भी इसको भाते,

आँख बचाकर मेरा इसको दृग से मीत बुलाते।

आओ बिट्टो खेलें हम सब फिर से आइस-पाइस,

छिपा-छिपौवल सँझलौके में बढ़ जाती गुंजाइश।

कोई काम करे बेमन से आती है उबकाई,

मैंने सोचा गीत लिखूँ पर बात नहीं बन पाई।

 

मेरा गाँव अभी तक पूरा बचपन में ही ठहरा,

नये कदम के लिए कहें तो बन जाता है बहरा।

इसको खेदो उसको मारो खेल यही है चलता,

बुरा देखकर भी पुरजन का अंतर कहाँ उबलता।

लँगड़ी खेलो लंगी मारो मिटे  सकल परछाई,

मैंने सोचा गीत लिखूँ पर बात नहीं बन पाई।

 

नन्हे-मुन्ने, अच्छे-आशा सबके ढंग निराले,

सबने अपने पार्श्व मार्ग पर जकड़े नव-नव ताले।

कोई चाहे ताला तोड़े छप्पन छूरी मारे,

अपनी चाहत की बस्ती के ये सब ही रखवारे।

मेरी कलम साधिका कौतुक में बन जाती दाई,

मैंने सोचा गीत लिखूँ पर बात नहीं बन पाई।

 

आज खुले अभिव्यक्ति पटल पर कौन गीत लिख भेजूँ,

मेरा समय चाहता क्या है कैसे लिखूँ-सहेजूँ।

जब कोरोना का विषाणु अब भू मंडल पर छाया,

मानव के सम्मुख संकट का बादल अति गहराया।

विश्व मंच या ग्राम मंच की सोच एक ही भाई,

मैंने सोचा गीत लिखूँ पर बात नहीं बन पाई।

 

बाबा कल्पनेश

 

 

 


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