kavita in hindi-सूख सी गई
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| kavita in hindi-सूख सी गई |
सूख सी
गई
तपकर सूख
सी गई
चेहरे पर असंख्य
झुर्रियों
की रेखाएं
आंखों में गहन
अंधेरा
भयानक रातों में
हादसों से
दो- दो
हाथ करती हुई
विपदाओं को ईश्वर-
प्रदत्त
अपना उपहार
मानते हुए
गार्हस्थ्य-
जीवन में निराशा
पूर्णरूपेण
मुंह चिढ़ाती हुई
बच्चों
की फरमाइशें
को
पूरी करती हुई उसे
आज
मैंने एक अलग
रंग-
रूप में देखा
जहां
अब न रूप
था, न रंग
था
बस ढर्रे
पर जीने का
एक ढंग था
चूल्हे- चौके में
ही अपनी शेष
ज़िन्दगी तलाशती हुई
अपने कपोलों
पर
जो कभी
गुलाबी सूर्ख थे
आग की
राख पोते
जर्जर और सूखी
अपनी जमीन
ढूंढ़ती हुई
देखी गई
अपने से
ही अनंत
सवाल करती
हुई
तपकर सूख
सी गई
अब मांसलयुक्त
शरीर नहीं
सिर्फ हड्डियां ही
बची रहीं
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| डॉ.सम्पूर्णानंद मिश्र |
डॉ.सम्पूर्णानंद मिश्र
प्रयागराज फूलपुर


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