पुष्पा श्रीवास्तव शैली की कलम से देखती हूं हिंदी लोकगीत पाठको के लिए प्रस्तुत है ।स्वर, पद और ताल से युक्त जो गान होता है वह गीत कहलाता है। गीत, सहित्य की एक लोकप्रिय विधा है। इसमें एक मुखड़ा तथा कुछ अंतरे होते हैं। प्रत्येक अंतरे के बाद मुखड़े को दोहराया जाता है। गीत को सिर्फ गाया जाता है, सुनाया नहीं जाता क्योंकि यह गेय पद्धति में ही लिखा जाता है ।
पुष्पा श्रीवास्तव शैली
देखती हूं हिंदी लोकगीत
बिना धूप मन की तपन देखती हूं।
सोये बिना ही सपन देखती हूं।
आबाद चम्मच हुआ जा रहा है।
कटोरे को करता नमन देखती हूं।
किये हाथ पीछे वो गंभीर चालें,
पिता जी का जर्जर सा तन देखती हूं।
इधर घूमते हैं चढ़ाकर के चश्मा,
बिटवा का चालो-चलन देखती हूं।
कुछ दिन बचे नौकरी के हमारी,
बापू का करते मनन देखती हूं।
कहे माँ न सोचो ,ये बिटिया तो है ना,
बदला तो है कुछ वतन देखती हूं।।
पुष्पा श्रीवास्तव शैली।
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