गुरुवार, 22 अक्टूबर 2020

hindi kavita mukt kar do mujhe raam

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डॉ. सम्पूर्णानंद मिश्र की कलम से रामायण हिन्दू रघुवंश के राजा राम की गाथा है। । यह आदि कवि वाल्मीकि द्वारा लिखा गया संस्कृत का एक अनुपम महाकाव्य, स्मृति का वह अंग है। इसे आदिकाव्य तथा इसके रचयिता महर्षि वाल्मीकि को 'आदिकवि' भी कहा जाता है। रामायण के छः अध्याय हैं जो काण्ड के नाम से जाने जाते हैं, इसके २४,००० श्लोक हैं। महाकाव्य की ऐतिहासिक वृद्धि और संरचनागत परतों को जानने के लिए कई प्रयास किए गए हैं; 7 वीं से 4 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में पाठ श्रेणी के शुरुआती चरण के लिए विभिन्न हालिया विद्वानों के अनुमान बाद के चरणों के साथ तीसरी शताब्दी सीई तक फैले हुए हैं। कुछ भारतीय कहते हैं कि यह ६०० ईपू से पहले लिखा गया।उसके पीछे युक्ति यह है कि महाभारत जो इसके पश्चात आया बौद्ध धर्म के बारे में मौन है यद्यपि उसमें जैन, शैव, पाशुपत आदि अन्य परम्पराओं का वर्णन है।अतः रामायण गौतम बुद्ध के काल के पूर्व का होना चाहिये। भाषा-शैली से भी यह पाणिनि के समय से पहले का होना चाहिये।

रामायण का पहला और अन्तिम कांड संभवत: बाद में जोड़ा गया था। अध्याय दो से सात तक ज्यादातर इस बात पर बल दिया जाता है कि राम विष्णु[ग] के अवतार थे। कुछ लोगों के अनुसार इस महाकाव्य में यूनानी और कई अन्य सन्दर्भों से पता चलता है कि यह पुस्तक दूसरी सदी ईसा पूर्व से पहले की नहीं हो सकती पर यह धारणा विवादास्पद है। ६०० ईपू से पहले का समय इसलिये भी ठीक है कि बौद्ध जातक रामायण के पात्रों का वर्णन करते हैं जबकि रामायण में जातक के चरित्रों का वर्णन नहीं है।

हिन्दू कालगणना के अनुसार रचनाकाल

रामायण का समय त्रेतायुग का माना जाता है। हिन्दू कालगणना चतुर्युगी व्यवस्था पर आधारित है जिसके अनुसार समय अवधि को चार युगों में बाँटा गया है- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग एव कलियुग जिनकी प्रत्येक चतुर्युग (४३,२०,००० वर्ष) के बााद पुनरावृत्ति होती है। एक कलियुग ४,३२,००० वर्ष का, द्वापर ८,६४,००० वर्ष का, त्रेता युग १२,९६,००० वर्ष का तथा सतयुग १७,२८,००० वर्ष का होता है। इस गणना के अनुसार रामायण का समय न्यूनतम ८,७०,००० वर्ष (वर्तमान कलियुग के ५,118 वर्ष + बीते द्वापर युग के ८,६४,००० वर्ष) सिद्ध होता है।

रामायण मीमांसा के रचनाकार धर्मसम्राट स्वामी करपात्री, गोवर्धन पुरी शंकराचार्य पीठ, पं० ज्वालाप्रसाद मिश्र, श्रीराघवेंद्रचरितम् के रचनाकार श्रीभागवतानंद गुरु आदि के अनुसार श्रीराम अवतार श्वेतवाराह कल्प के सातवें वैवस्वत मन्वन्तर के चौबीसवें त्रेता युग में हुआ था जिसके अनुसार श्रीरामचंद्र जी का काल लगभग पौने दो करोड़ वर्ष पूर्व का है। इसके सन्दर्भ में विचार पीयूष, भुशुण्डि रामायण, पद्मपुराण, हरिवंश पुराण, वायु पुराण, संजीवनी रामायण एवं पुराणों से प्रमाण दिया जाता है।

 

मुक्त कर दो मुझे राम*



‌‌  रावण ने राम से कहा

मुझे अब मत मारो !


माना कि त्रेता में

सीता- हरण करने का

मैं अपराधी था

अपराध की सजा मिलनी चाहिए

लेकिन राम कितनी बार !


हर बार मैं मर रहा हूं

घुट- घुटकर  जी रहा हूं

क्या मैं निरंतर इसी तरह

से जलाया जाऊंगा ?


सूली पर लटकाया जाऊंगा

लोग कब तक तमाशा देखेंगे

अब मुझे बख्श़ दो !


अरे! उस देवी को तो

स्पर्श तक नहीं किया मैंने

एक तरफ़ मैं उसे डराता था

तो दूसरी तरफ़

त्रिजटा द्वारा समझाता था

अबमुझे मुक्त कर दो राम !


असत्य को सत्य के हथौड़े ने

पीट- पीट कर कुंदन

बना दिया

तुम्हारे सान्निध्य ने मेरे भाल पर

रामत्व का चंदन लगा दिया

सभ्यता एवं संस्कृति का

नया पाठ पढ़ा दिया

लेकिन राम

अपनी शक्ति का वही अचूक प्रभाव

तुम आज दिखला दो

इस कलियुग में भी

अपना वह अभेद्य बाण चला दो

बहू- बेटियों की मर्यादा

ऐसे ही नीलाम होगी

हाथरस की बेटी की हत्या

क्या  सरेआम होगी !

तुम कहां हो राम !

एक अभिमंत्रित बाण

इन पर भी चला दो

मुझे मुक्त कर दो राम

मुझे अब मत मारो !

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डॉ. सम्पूर्णानंद मिश्र 



डॉ. सम्पूर्णानंद मिश्र

प्रयागराज फूलपुर

 


1 टिप्पणी:

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