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| सृष्टि कुमार श्रीवास्तव |
सृष्टि कुमार श्रीवास्तव की कलम से हिंदी कविताये
( 1.)
अन्तर मन मे दीप जले
द्वारे दीप जले।
अंधकार की छाती पर
आओ मूँग दले ।
पंक्तिबद्ध जलते दीपों से
आओ ओम लिखें
राम कृष्ण की धरती का
जग को तेज दिखे।
सबसे आगे भारत हो
पीछे विश्व चले।
कांप उठे दिल अँधियारे का
ऐसी ज्योंति जले।।
(2).
हर तरफ पर्दे तने है
जुर्म के साये घने हैं
मर रही है आदमीयत
देवता पत्थर बने हैं ।
देश की आवाज मद्धिम
तेज दिल की धड़कने हैं
सुर्खियों मे आज वे सब
सुर्ख जिनकी अचकने है ।
नम्र होकर दीप जलते
जुगनुओं के सर तने हैं।
उस तरफ तलवार उनकी
इस तरफ बस गरदने हैं।
किस तरह पायेंगे मंजिल
अड़चने दर अड़चने हैं।
(3).
कृतघ्नता के साथ जीना पाप है व्यभिचार है।
कैसे उरिण हो जिन्दगी श्रेष्ठतम
विचार है ।
हम करें कैसे भरोसा विश्व मे उस
व्यक्ति का।
जो विरोधी हो गया हो आभार की अभिव्यक्ति का।
कविता कला संस्कृति का है जिसे
कुछ भी पता ।
मानवीय उत्कर्ष का आधार है
कृतज्ञता ।
प्रार्थनायें और पूजा ध्यान की सारी कलाएं ।
सबसे प्रखर निर्मल हृदय की
शुद्धतं शुभ भावनाएँ ।
(4).
मुझको पीड़ा में पलने का अभ्यास बहुत है।
इसीलिये लगता है कोई
पास बहुतहै ।
कभी नही आयेगा कोई मधु
का कलश लिये।
यदि आये भी तो मेरे होंठो की
प्यास बहुत है।
(5).
आंखें दीपक हो गईं नेह करे उजियार।
बालम आय विदेस से सांझ हुई रतनार ।।
कोरोना की मार से धरती है बेहाल।
जब घर आये साजना मै तो हुई निहाल।।
जब आया संदेश यह अब चल्हैं
बस रेल।
मन के दियना जल उठे बिन बाती
बिन तेल ।।
सुनकर मन घायल हुआ पैदल हैं
रघुनाथ।
दूर देश लम्बा सफ़र भगवन देना
साथ।।
कैसे दुर्दिंन आ गये बड़े बड़े हैं
दीन ।
सबके मुख निकसत यही भाड़ मा
जाय चीन ।।
ओर न दूजी बात है अपना ही है दोष।
नाम दाम की दौड़ मे छिटक गया
संतोष।।
नत मस्तक साधन हुए हुई व्यवस्था फ़ेल।
मानव सारे कैद मे पंछी करें
कुलेल।।
गंगा निर्मल हो गई शुभ्र हुई जल धार।
घाट घाट के देवता करते जय
जयकार।।
( 6.)
लाभ हानि के चिंतन का कोई आधार नही होता।
कर्तव्यों की बात करो फल मे अधिकार नही होता
फूलों के रंग रोगन से तन की ही सज्जा होती है
जब तक प्राणों मे आग न हो
पूरा शृंगार नही होता।
(7).
ज़िन्दगी तो प्यार मे है
प्यार के इज़हार मे है
तार मे कुछ भी नही
बात तो झंकार मे है।
बस उसी की सोंच तू
जो तिरे अधिकार मे है।
ढह गये मेयार सारे
जग बड़ी रफ्तार मे है।
सिर्फ हम बेकल नही
बेकली संसार मे है।
हम करें किस पर यकीं
आदमी बाज़ार मे है।
सृष्टि कुमार श्रीवास्तव

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