bachpan ki yado par kavita-बाबा कल्पनेश
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| bachpan ki yado par kavita |
बच्चे कितने भोले भाले
बच्चे कितने भोले भाले इनके खेल निराले,
जिसे देख कर हम सब जैसे रखते मुख पर ताले।
कवि-वैज्ञानिक चित्रकार हों कितने ही दिल वाले,
इनके सम्मुख सबके खुशियों पर पड़ जाते पाले।
खुला चित्र चिंतन का जैसे बिट्टो से मैं बोला,
बिट्टो-बिट्टो आओ देखो बिट्टो का मन तोला।
आई दौड़ तुरत बिट्टो ने बच्चों सा रस घोला,
देखो-देखो इन बच्चों का कितना है मन भोला।
करतल में लेकर के चप्पल सेल्फी ये सब लेते,
सच्ची खुशियों के अधिकारी कैसे खुशियाँ सेते।
जो जन इनको देखें खुशियों से उनको भर देते,
खुशियाँ आकर द्वार बुहारें मन से यदि हम चेते।
जितने बच्चे सब अधरों की हँसी बन रही दासी,
और कहाँ संभव है दर्शन ऐसी छवि उल्लासी।
भले लाख हो तीर्थ-तपस्या मथुरा अथवा काशी,
बच्चों के उर अंतर बैठा वह माधव अविनाशी।
कल्पनेश यह बचपन अपना खुलकर सम्मुख आया,
हँसी-खुशी का मानसून बन चित्त गगन मड़राया।
इन बच्चों से ही पाती है पूरी धरती छाया,
इनके ही सम्बल से झंडा मानव ने फहराया।
बाबा कल्पनेश

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