navaraatri aakhir kisake lie
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| आकांक्षा सिंह "अनुभा" |
नवरात्रि आखिर किसके लिए?
स्त्री-शक्ति के विभिन्न आयामों की प्रतीक नौ देवियों की आराधना के नौ-दिवसीय पर्व शारदीय नवरात्रि का आरंभ हो गया है। स्त्रियों के प्रति हमारे देश में हमेशा से दोहरा रवैया रहा है। वह एक साथ पूजा की पात्र भी है और मौज-मस्ती का सामान भी। स्वर्ग की सीढ़ी भी और नरक का द्वार भी।मंदिरों में स्थापित मूर्तियां भी और पुरुषों की अय्याशी के लिए बिकने वाली देह भी। स्त्रियों के प्रति आदर इतना कि मातृशक्ति को हमने ईश्वर के समकक्ष रखा और काम-लिप्सा इतनी कि तीन साल की बच्ची से लेकर अस्सी साल की बूढ़ी भी इस देश में सुरक्षित नहीं। पुरुषों का यह दोगलापन नवरात्रि के नौ पवित्र दिनों में भी जारी रहने वाला है।
देवियों की अखंड पूजा का कर्मकांड भी चलेगा और देश के कोने-कोने से जीवित देवियों की भ्रूण हत्या, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और हत्याओं की खबरें भी आती रहेंगी। हमारी जिस संस्कृति में सूअर, मछली, कछुआ, चूहा, बैल, उल्लू, शेर और गिद्ध तक को देवी-देवताओं के अवतार या वाहन का पवित्र दर्जा हासिल है,उस देश में स्त्रियों के प्रति यह अमानुषिक दृष्टिकोण बहुत हैरान करता है।
यह सही है कि देश के अधिसंख्यक पुरुष स्त्रियों के प्रति संवेदनशील ही होते हैं, लेकिन इतने अच्छे लोग मिलकर अगर देश की आधी आबादी को हजारों सालों में एक सुरक्षित दुनिया नहीं दिला सके तो क्या उन्हें स्त्री-शक्ति की प्रतीक देवियों की पूजा का कोई नैतिक अधिकार है भी ? सोचिएगा जरूर !
मेरी तरफ से स्त्रियों और सिर्फ स्त्रियों को शारदीय नवरात्रि की बहुत शुभकामनाएं, इस उम्मीद के साथ कि आप कर्मकांडों में न उलझकर अपने भीतर की दुर्गा को पहचानें और उन्हें अपने जीवन में उतार लें!!!!
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आकांक्षा सिंह
"अनुभा"
रायबरेली,
उत्तरप्रदेश।

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