Abhee pukaro mat hindi kavita
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| सृष्टि कुमार श्रीवास्तव |
अभी पुकारो मत
अभी पुकारो मत
हमे पुकारो मत।
झंझावत मे जी लेने दो
आज हलाहल पी लेने दो
मलयानिल के मृदु झोंकों से
अभी गुजारो मत।
अभी पुकारो मत।
पाकर प्रेममयी पुलकन को
वासन्ती रँगमयी छुवन को
भूल न जाऊं अपने प्रण को
अभी मुझे जाने दो रण को
लहू-लुहान अभी होना है
अभी निहारो मत
अभी पुकारो मत।
क्रुद्ध समय को छल जाने दो
सूरज को भी ढल जाने दो
पंख हमारे जल जाने दो
तीर वक्ष पर चल जाने दो।
खुल जाने दो शिखा हमारी
अभी संवारो मत
अभी पुकारो मत।
मन मे टीस हृदय मे व्रण है
जीवन हुआ आज विषषण है
धधक रहा तन मन यौवन है
रोम रोम मे भरी अगन है
तप कर कुंदन हो जाने दो
अभी निखारो मत
अभी पुकारो मत।
बड़े वेग से जब फूटेंगे
पर्वत की छाती कूटेंगे
कोष चांद का हम लूटेंगे
बूंद बूंद अम रि त घूंटेंगे
अभी और जाने दो गहरे
अभी उबारो मत
अभी पुकारो मत।
झंझावत मे जी लेने दो
आज हलाहल पी लेने दो
मलयानिल के मृदु झोंकों से
अभी गुजारो मत।
अभी पुकारो मत।
सृष्टि कुमार श्रीवास्तव
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