Boye naye nagar ke beej
बोए नये नगर के बीज
गये काटते जंगल बोए नये नगर के बीज,
आदम कद का मानव लेकिन खड़ा उसी दहलीज।
चला जहाँ से खड़ा वहीं पर ऐसा मानव वीर,
अब भी नयन लाल मंगल सा शुष्क नहीं है नीर।
थोड़ा स्वार्थ सधे अपना तो हत देता बेपीर,
पन्ने पर जो दया लिखी है ले जाओ वह चीर।
भरा खेत में पानी बाहर कहीं न जाए छीज,
गये काटते जंगल बोए नये नगर बीज।
अब तक भी प्राथमिक पाठ यह नहीं कर सका याद,
कोई कहता अल्ला-अल्ला कोई देता दाद।
गाय-भैंस-बकरा सब पाले लेकिन लेता चाट,
सरिता-नद-नाले निज हित में सबको लेता पाट।
शोभामय वाणी में निज को कह देता नाचीज,
गये काटते जंगल बोए नये नगर बीज।
सारी प्रकृति मनुज की खेती निर्मित करता मेड़,
जहाँ न कोई और वृक्ष हों सीना ताने रेड़।
संविधान सब एक तरफ है खूँटा अपने ठाँव,
धर्म ग्रंथ कह दें क्यों मारें लाठी अपने पाँव।
आत्म वस्तु से प्यारा कोई कैसै कहे अजीज,
गये काटते जंगल बोए नये नगर बीज।
मानवता का मतलब केवल अपने हित की बात,
प्रतियोगी बनकर के देना और जनों को घात।
फिर उज्वल कुंडली मारकर लिखवाना निज नाम,
करुणा-दया-क्षमा की बातें यहाँ कहाँ विश्राम।
अहंकार के पाद प्राँत में पर्वत छीजें भीज,
गये काटते जंगल बोए नये नगर बीज।
कभी भगीरथ लाए गंगा वैज्ञानिक बलवीर,
गाँव-नगर-घर-आँगन गंगा निकलीं अब भू चीर।
पशु-पंक्षी हैं और अन्य जो कहाँ बुझाएं प्यास,
मानव तो चंदा-मंगल पर चला रचाने रास।
कल्पनेश तू बैठ यहाँ पर गले पहन तावीज,
गये काटते जंगल बोए नये नगर बीज।
बाबा कल्पनेश

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
सभी साथियों से अनुरोध है कि यदि आपकी मातृभाषा हिंदी है,
तो यहाँ अपनी टिप्पणी भी हिंदी (देवनागरी लिपि)
में ही प्रकाशित करने की कृपा कीजिए!
टिप्पणी पोस्ट करने से पहले
ई-मेल के द्वारा सदस्यता ले लिया कीजिए,
ताकि आपकी टिप्पणी प्रकाशित होने के बाद में यहाँ होनेवाली चर्चा का पता भी आपको चलता रहे और आप बराबर चर्चा में शामिल रह सकें!