मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

jhuka hua dhvaj kavita-झुका हुआ ध्वज/सम्पूर्णानंद मिश्र

 jhuka hua dhvaj kavita

झुका हुआ ध्वज

jhuka- hua- dhvaj- kavita
झुका हुआ ध्वज

 

रामनाथ तुम क्यों

लड़खड़ा रहे हो‌ ?

तुम्हारे ओंठ क्यों

फड़फड़ा रहे हैं

क्या बात है

तुम्हारे चेहरे का ध्वज

क्यों झुकाहुआ है

पूरा देश नववर्ष का

जश्न मनाने जा रहा है

तुम्हारी चाल में फिर

इतनी सुस्तीक्यों है

रामनाथ ने कहा

साहब !

हम लोगों के लिए नववर्ष

का कोई अर्थ नहीं है

मुझ जैसे गरीबों के

लिए सब व्यर्थ है

रोज़ कुंआ खोद कर

पानी पीनाहै 

और ऐसे ही जीना है

कोई फ़र्कपड़ने

वाला नहीं है

हाथों में पड़ी दरारों

को भी कोई

नहीं भरने वाला है

पुराना साल हो या नया

क्यामतलब है

भयानक रात

की तरह डराती है सयानी बिटिया

और यह महंगाईहमेशा

मुंह चिढ़ाती है

अब तो इस कमाईमें

पेटभरपाना मुश्किल है

कैसे हाथउसके

पीलेकर पायेंगे

अब तो दो वक्त की रोटी

खिलाना भी मुश्किल है

ऐसी स्थिति में

एक बापडोली परबैठाकर

अपनी बेटी को विदा कर दे

यही उसके लिए नववर्षहै।

jhuka- hua- dhvaj -kavita

डॉ० सम्पूर्णानंद मिश्र

प्रयागराज फूलपुर

7458994874

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