vo pratima hee patthar nikalee
वो प्रतिमा ही पत्थर निकली
हमने बीज जहां बोये थे
वो धरती ही बंजर निकली।
बड़े जतन से जिसे संवारा
अपना था जो कुछ भी वारा ।
रंग रंग के फूल चढ़ाए
हाथ लगा केवल अंगारा।
हमने जिसकी पूजा की थी
वो प्रतिमा ही पत्थर निकली
उसने ऐसे पंख मरोड़े
कोई जैसे शाख झिंझोड़े
या कोई शिशु अपहृत करके
दूर कही जंगल मे छोड़े ।
जिसको सबसे कम आंका था
वो पीड़ा ही अजगर निकली।
सुविधाभोगी सोंच अपाहिज
वैशाखी के बल पर चलती
वो क्या जाने प्यार व्यार को
जिसके उर मे पीर न पलती
बड़ी अभागन नदी कि जिससे
कोई नहर न कट कर निकली
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| सृष्टि कुमार श्रीवास्तव |


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