maa bharti ki vedana
मां - भारती की वेदना
जय -जय -जय मां भारती
करो सुमन स्वीकार ।
सागर चरणों में तेरे ,
हिम - किरीट श्रृंगार ।।
मुख पर कैसी वेदना ,
क्यों बहती अश्रू - धार ॽ
शीघ्र कहो मां - भारती ,
अपनी करुण - पुकार ।।
मां , तेरे संकेत पर ,
कह , तारे लें आऊं ।
यदि चाहें बलिदान तू ,
शीश भेंट में लाऊं ।।
मां - भारती
पुत्र सुकवि मेरी व्यथा ,
जन- जन तक पहुंचाओ।
जंग लगे गणतंत्र को ,
क्रान्ति - सूर्य दिखलाओ ।।
देखो कवि , गणतंत्र में ,
गण अयोग्य - बस तन्त्र ।
संविधान कंकाल सम ,
नाम - मात्र गणतंत्र ।।
भ्रष्ट - तन्त्र गणतंत्र से ,
सन्तान मेरी अति त्रस्त ।
नेता हैं सब स्वार्थी ,
देश - द्रोह में मस्त ।।
सीमाओं पर अति क्रमण ,
नित्य - नित्य की बात ।
शान्ति - वार्ता चल रही ,
वहीं ढाक के पात ।।
मेरे तन के घाव- यह ,
आतंको की देन ।
तू कब चेतेगा अरे ,
मां के भीगे नैन ।।
कवि अपनी हुंकार से ,
मॄत प्राणों को फूंक ।
देश - प्रेम का घोष हो ,
क्रान्ति - क्रान्ति की गूंज ।।
ऐसी कविता लिख सुकवि
जन - मानस हिल जाए ।
स्वाभिमान जो खो- गया
फिर वापिस मिल जाए ।।
भावी नव गणतंत्र में ,
सब हों शिक्षित - शिष्ट-।
माता की संतुष्टि हो ,
लख गणतंत्र अभीष्ट ।।
साहित्य रचो ऐसा सुकवि,
देश -- भक्ति युग आए ।
साहित्य - कला और संस्कृति
जन - जन में रम जाए ।।
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| सीताराम चौहान पथिक |
+91- 9650621606
सीताराम चौहान पथिक


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