गुरुवार, 5 नवंबर 2020

मरती संवेदनाएं/डॉ.संपूर्णानंद मिश्र-maratee sanvedanaen

लेखक के बारे मे जाने

 

मरती संवेदनाएं



आज संवेदनाएं

   मर चुकी हैं

स्वार्थपरता की भट्ठी

  में पूरी तरह जर चुकी हैं 

दैवीय आपदाओं से मरते हुए घुरहू, काशी,पत्तू  

के लिए भी संवेदनाएं अपनी

 भाषाई जुब़ान खो चुकी है 

  सड़क पर प्रजनन करती 

इक्कीसवीं सदी की स्त्रियां 

 स़िर्फ जादूगर का तमाशा है 

जहां तमाशबीन का मौन 

घुट रही संवेदनाओं 

की एक बेजान भाषा है

यह एक यक्ष प्रश्न खड़ा है

 समाज व राष्ट्र के 

सामने अनुत्तरित सा पड़ा है

किसी की मुट्ठी में शूल आ जाए

किसी की मुट्ठी में फूल आ जाए 

इस पर भी

किसी प्रतिक्रिया का न उठना 

 हमारी संवेदनाओं

का दम तोड़ना है!

किस युग में जी रहे हैं 

रोज़ संवेदनाओं को 

क्यों पी रहे हैं

  किसी दिन उगल दें 

 तो संवेदनाओं की 

  एक उम्मीदों     

  के सहारे ही

  कुछ लोगों को 

  बेंटीलेटर पर जाने से

 रोका जा सकता है 

गुफ़ाओं में चिरकाल से पड़ी 

बजबजाती दुर्गन्धित 

असंवेदनशीलता की बंद मुट्ठियों 

के दरवज्जे की अर्गल

 को खोला जा सकता है

 

 संपूर्णानंद मिश्र

 प्रयागराज फूलपुर

  7458994874

हमें विश्वास है कि हमारे लेखक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस वरिष्ठ सम्मानित लेखक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।लेखक की बिना आज्ञा के रचना को पुनः प्रकाशित’ करना क़ानूनी अपराध है |आपकी रचनात्मकता को हिंदीरचनाकार देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए help@hindirachnakar.in सम्पर्क कर सकते है|whatsapp के माद्यम से रचना भेजने के लिए 91 94540 02444,  संपर्क कर कर सकते है।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

सभी साथियों से अनुरोध है कि यदि आपकी मातृभाषा हिंदी है,
तो यहाँ अपनी टिप्पणी भी हिंदी (देवनागरी लिपि)
में ही प्रकाशित करने की कृपा कीजिए!
टिप्पणी पोस्ट करने से पहले
ई-मेल के द्वारा सदस्यता ले लिया कीजिए,
ताकि आपकी टिप्पणी प्रकाशित होने के बाद में यहाँ होनेवाली चर्चा का पता भी आपको चलता रहे और आप बराबर चर्चा में शामिल रह सकें!