kashmakash kalpana awasthi
कशमकश
इक कशमकश में उलझ क्यों गई है जिंदगी
चलती भी नहीं और सम्हलती भी नहीं
इक सूरत-सी बन गई है मुश्किलों की
जो बदलती भी नहीं उससे निकलती भी नहीं
कभी- कभी ऐसे हालात होते हैं जब वजू़द डगमगाता है
हमेशा मजबूत होने के बाद भी मन घबराता है
सोचती हूँ, क्या सबकुछ पा लेना ही जीवन है
और जो नही पाया उसी पर क्यों पछताता है
इक गुबार भरा है,जिसे निकालना है
जो कदम थके हैं संघर्ष से, उन्हें सम्हालना है
बदल गया है ज़माना पर मैं बदलती भी नहीं
इक कशमकश
में उलझ क्यों
गई है
जिंदगी चलती भी नहीं और सम्हलती भी नहीं
सब कुछ बयां हो जाए ए बात ही झूठी है
क्योंकि कुछ उम्मीदें बँधकर भी बहुत बार टूटी हैं
इन टूटी उम्मीदों को जोड़ना होगा
मन में भरे कशमकश के जाल को तोड़ना होगा
जो नहीं मिला उसे भुला के जीना भी हर्ष है
चलने वाले तेरे हर कदम पर इक नया संघर्ष है
कितना मुश्किल भरा है ये जीवन का सफर
और अँधेरे में छिपी है उजाले की इक किरण
जो निकलती भी नहीं और ढलती भी नहीं
इक कशमकश
में उलझ क्यों
गई है
जिंदगी चलती भी नहीं और सम्हलती भी नहीं
कल्पना तो संघर्ष को संग +हर्ष (खुशी) मानती है
बिना हिम्मत हारे लड़ेगी ये बात जानती है
क्योंकि मुश्किलों की सूरत ऐसे बदलती भी नहीं
इक कशमकश में उलझ क्यों गई है
जिंदगी चलती भी नहीं और सम्हलती भी नहीं।
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Dil chu liya❤️
जवाब देंहटाएंAwesome lines mam
जवाब देंहटाएंVery nice line directly related to the life of peoples
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