रविवार, 8 नवंबर 2020

बुढ़िया दादी-Buddhi dadi

 Buddhi dadi

Buddhi-dadi
Buddhi-dadi

बुढ़िया दादी

तीन चार ‌दिन से 

गांव की बीमार

  बुढ़िया दादी 

ठंड लगने से

कल  स्वर्ग सिधार गई

रोज़ कौड़ा बारती थी

लोगों को एक साथ जुटाती थी 

जाड़े से ठिठुरते हुए लोगों की

जान बचाती थी 

छोटे-छोटे बच्चों को 

तरह-तरह की

कहानियां सुनाती थी 

 संस्कारों को सिखाती थी 

राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाती थी

  अपने आप में एक

मुक्कमिल ‌पाठशाला थी 

   जहां न कोई भेद था

     न श्वेत- अश्वेत 

     का कोई छेद था

    न किसी का किसी ‌से

      कोई विरोध था

    न ही किसी तरह का

     कोई अवरोध था

     गांव का कौड़ा-स्थल

    देश का सबसे सुंदर

       लोकतंत्र था 

   ‌‌    जहां लोक था 

        तंत्र नहीं था‌ 

       हर आदमी गांव

         का स्वतंत्र था

        यहां न मंदिर का

         कोई झगड़ था

         न मस्जिद ‌का 

         कोई रगरा था 

      आज ‌इस स्थल पर

        सन्नाटा पसरा है 

       न‌ कोई कौड़ा बरा 

            न लोग दिखे‌ 

    न ही बच्चों ने कहानियां सुनी

   दुःख तो इस बात का है कि

    लोगों ने बुढ़िया दादी के

      इस कौड़ा-स्थल रूपी

        लोकतंत्र ‌को भी 

     उनके साथ -साथ ही

    पूरी तरह से जला दिया 


डॉ. सम्पूर्णानंद मिश्र

  

प्रयागराज फूलपुर

   7458994874

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