बुधवार, 18 नवंबर 2020

awadhi bhasha ki kavita- ललनवां | अरविंद जयसवाल

 awadhi bhasha ki kavita 

ललनवां

awadhi- bhasha-ki- kavita
awadhi bhasha ki kavita


 

डलिया में सोवैं ललनवां,

बलम तनी झूला झुलाइ दो,

चैत महीना मटर सब पाकी,

हरहा गोरु करैं ताका झांकी,

जल्दी कराओ कटनियाँ,

बलम तनी झूला झुलाइ दो,

डलिया में सोवैं ललनवां,

बलम तनी झूला झुलाइ दो।()

 

होईगै दुपहरी रोटी पानी,

भैंसी पियासी करै का सानी पानी,

जल्दी बुझाओ चिलमियां,

बलम तनी झूला झुलाइ दो,

डलिया में सोवैं ललनवां,

बलम तनी झूला झुलाइ दो। ()

 

मिठके बिरौना में महुवा गिरल बा,

अबहीं दुपहरी में वोहू बिनै का,

काहे करत ढीला बानी,

बलम तनी झूला झुलाइ दो,

डलिया में सोवैं ललनवां,

बलम तनी झूला झुलाइ दो। ()

 

जल्दी से सारा काम निपटाओ,

रोटी बनाई तुमहूँ अब खाओ,

अरविंद खोलो उबहनियां,

बलम तनी झूला झुलाइ दो,

डलिया में सोवैं ललनवां,

बलम तनी झूला झुलाइ दो। ()


त्रिपुरारी

awadhi- bhasha- ki- kavita


 

दो नयनों की ज्योंति जलाई

संप्रभुता की प्रभुताई

उन नयनों की जलधारा से

चरण धूलि धुलने आई

दो नयनों की ज्योंति जलाई

संप्रभुता की प्रभुताई। ()

 

हे अभयंकर हे बाघम्वर

शरण तुम्हारी मैं आई

किस विधि पूंजा करूँ तुम्हारी

समझ नहीं अब तक पाई

दो नयनों की ज्योंति जलाई

संप्रभुता की प्रभुताई। ()

 

विश्वनाथ मम नाथ।

तुम्हीं से अंतिम आशा

भटक भटक कर इस दुनियाँ में

मैं तो हुई पराई।

दो नयनों की ज्योंति जलाई

संप्रभुता की प्रभुताई। ()

 

अब तो आश दिगम्बर तेरी

दुःख हरण मंगल दाता

त्रिपुरारी अब जाऊँ कहाँ को

पड़ी चरण लपटाई

दो नयनों की ज्योंति जलाई

संप्रभुता की प्रभुताई। ()

अरविंद जयसवाल

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