शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

Short poetry on neend-डॉ. दया शंकर पाण्डेय

 Short poetry on neend

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Short-story-on-neend

बात सुन्दरता की तेरी

बात सुन्दरता की तेरी क्यों ज़ुबां कहती नहीं है,

जुगनुओं को पकड़ने से रात क्यों जाती नहीं है,

आँख ख़ुद उठकर गयी है ख़्वाब कैसे देखता मैं,

पाँवड़े कैसे बिछाता  राह जब भाती नहीं है,

ज़िन्दगी में ख्वाहिशें इतनी कहाँ से आ पड़ी हैं,

अब तो राहें उस मकां से होकर भी जाती नहीं हैं

मुद्दतें गुज़रीं ठिकाना ज़ेहन में अब भी पड़ा है,

तेरी तरह अब कोई चिलमन को सरकाती नहीं है।

नींद इन आँखों से अब रुक रुक कर पर्दा कर रही है,

अब दिये सी आँख में क्यों नींद की बाती नहीं है।
Short-poetry-on-neend
डॉ. दया शंकर पाण्डेय



                 

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