Short poetry on neend
![]() |
| Short-story-on-neend |
बात सुन्दरता की तेरी
बात सुन्दरता की तेरी क्यों ज़ुबां कहती नहीं है,
जुगनुओं को पकड़ने से रात क्यों जाती नहीं है,
आँख ख़ुद उठकर गयी है ख़्वाब कैसे देखता मैं,
पाँवड़े कैसे बिछाता राह जब भाती नहीं है,
ज़िन्दगी में ख्वाहिशें इतनी कहाँ से आ पड़ी हैं,
अब तो राहें उस मकां से होकर भी जाती नहीं हैं
मुद्दतें गुज़रीं ठिकाना ज़ेहन में अब भी पड़ा है,
तेरी तरह अब कोई चिलमन को सरकाती नहीं है।
नींद इन आँखों से अब रुक रुक कर पर्दा कर रही है,
अब दिये सी आँख में क्यों नींद की बाती नहीं है।
हमें विश्वास है कि हमारे लेखक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस वरिष्ठ सम्मानित लेखक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।लेखक की बिना आज्ञा के रचना को पुनः प्रकाशित’ करना क़ानूनी अपराध है |आपकी रचनात्मकता को हिंदीरचनाकार देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए help@hindirachnakar.in सम्पर्क कर सकते है|


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
सभी साथियों से अनुरोध है कि यदि आपकी मातृभाषा हिंदी है,
तो यहाँ अपनी टिप्पणी भी हिंदी (देवनागरी लिपि)
में ही प्रकाशित करने की कृपा कीजिए!
टिप्पणी पोस्ट करने से पहले
ई-मेल के द्वारा सदस्यता ले लिया कीजिए,
ताकि आपकी टिप्पणी प्रकाशित होने के बाद में यहाँ होनेवाली चर्चा का पता भी आपको चलता रहे और आप बराबर चर्चा में शामिल रह सकें!